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तताँरा-वामीरो कथा

- लीलाधर मंडलोई 

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अंदमान द्वीपसमूह का अंतिम दक्षिणी द्वीप है लिटिल अंदमान। यह पोर्ट ब्लेयर से लगभग सौ किलोमीटर दूर स्थित है। इसके बाद निकोबार द्वीपसमूह की श्रृंखला (कड़ी) आरंभ होती है जो निकोबारी जनजाति की आदिम (आदि मानव की) संस्कृति के केंद्र हैं। निकोबार द्वीपसमूह का पहला प्रमुख द्वीप है कार-निकोबार जो लिटिल अंदमान से 96 कि-मी- दूर है। निकोबारियों का विश्वास है कि प्राचीन काल में ये दोनों द्वीप एक ही थे। इनके विभक्त (अलग) होने की एक लोककथा है जो आज भी दोहराई जाती है।

सदियों (सैकड़ों वर्षों पूर्व) पूर्व, जब लिटिल अंदमान और कार-निकोबार आपस में जुड़े हुए थे तब वहाँ एक सुंदर-सा गाँव था। पास में एक सुंदर और शक्तिशाली युवक रहा करता था। उसका नाम था तताँरा। निकोबारी उसे बेहद(बहुत) प्रेम करते थे। तताँरा एक नेक(अच्छाई के रास्ते पर चलनेवाला) और मददगार व्यक्ति था। सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहता। अपने गाँववालों को ही नहीं, अपितु समूचे द्वीपवासियों की सेवा करना अपना परम कर्त्तव्य समझता था। उसके इस त्याग की वजह से वह चर्चित था। सभी उसका आदर करते। वक्त मुसीबत में उसे स्मरण करते और वह भागा-भागा वहाँ पहुँच जाता। दूसरे गाँवों में  भी पर्व-त्योहारों के समय उसे विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता। उसका व्यक्तित्व तो आकर्षक था ही, साथ ही आत्मीय स्वभाव की वजह से लोग उसके करीब रहना चाहते। पारंपरिक पोशाक के साथ वह अपनी कमर में सदैव एक लकड़ी की तलवार बाँधे रहता। लोगों का मत था, बावजूद लकड़ी की होने पर, उस तलवार में अद्भुत दैवीय शक्ति थी। तताँरा अपनी तलवार को कभी अलग न होने देता। उसका दूसरों के सामने उपयोग भी न करता। किंतु उसके चर्चित साहसिक कारनामों के कारण लोग-बाग तलवार में अद्भुत शक्ति का होना मानते थे। तताँरा की तलवार एक विलक्षण(अद्भुत) रहस्य थी। एक शाम तताँरा दिनभर के अथक परिश्रम के बाद समुद्र किनारे टहलने(घूमने) निकल पड़ा। सूरज समुद्र से लगे क्षितिज तले डूबने को था। समुद्र से ठंडी बयारें(हवा) आ रही थीं। पक्षियों की सायंकालीन चहचहाहटें शनैः शनैः (धीरे धीरे) क्षीण(कम) होने को थीं। उसका मन शांत था। विचारमग्न(सोच में डूबा) तताँरा समुद्री बालू (रेत)पर बैठकर सूरज की अंतिम रंग-बिरंगी किरणों को समुद्र पर निहारने(मोहित होकर देखना) लगा। तभी कहीं पास से उसे मधुर गीत गूँजता सुनाई दिया। गीत मानो बहता हुआ उसकी तरफ़ आ रहा हो। बीच-बीच में लहरों का संगीत सुनाई देता। गायन इतना प्रभावी था कि वह अपनी सुध-बुध (सोच-समझ) खोने लगा। लहरों के एक प्रबल वेग(तेज़ गति) ने उसकी तंद्रा(विचारमग्नता, नींद) भंग(तोड़ना) की। चैतन्य (सोच-समझ आते ही) होते ही वह उधर बढ़ने को विवश हो उठा जिधर से अब भी गीत के स्वर बह रहे थे। वह विकल(बैचेन) सा उस तरफ़ बढ़ता गया। अंततः उसकी नज़र एक युवती पर पड़ी जो ढलती हुई शाम के सौंदर्य में बेसुध, एकटक समुद्र की देह(शरीर) पर डूबते आकर्षक रंगों को निहारते(मोहित होकर देखना)  हुए गा रही थी। यह एक श्रृंगार गीत था।

उसे ज्ञात ही न हो सका कि कोई अजनबी युवक उसे निःशब्द(बिना बोले) ताके(देखे) जा रहा  एकाएक(अचानक) एक है। ऊँची लहर उठी और उसे भिगो गई। वह हड़बड़ाहट में गाना भूल गई। इसके पहले कि वह सामान्य हो पाती, उसने अपने कानों में  गूँजती गंभीर आकर्षक आवाज़ सुनी। ‘तुमने एकाएक इतना मधुर गाना अधूरा क्यों छोड़ दिया?’ तताँरा ने विनम्रतापूर्वक कहा। अपने सामने एक सुंदर युवक को देखकर वह विस्मित(आश्चर्यचकित) हुई। उसके भीतर किसी कोमल भावना का संचार हुआ। किंतु अपने को संयतकर(नियंत्रित) उसने बेरुखी(अरुचि) के साथ जवाब दिया। ‘पहले बताओ! तुम कौन हो, इस तरह मुझे घूरने (लगातार देखने) और इस  असंगत(जिसका सम्बन्ध न हो ऐसे) प्रश्न का कारण? अपने गाँव के अलावा किसी और गाँव के युवक के प्रश्नों का उत्तर देने को मैं बाध्य नहीं। यह तुम भी जानते हो।’

तताँरा मानो सुध-बुध(सोच-समझ) खोए हुए था। जवाब देने के स्थान पर उसने पुनः अपना प्रश्न दोहराया। ‘तुमने गाना क्यों रोक दिया? गाओ, गीत पूरा करो। सचमुच तुमने बहुत सुरीला कंठ पाया है।’‘यह तो मेरे प्रश्न का उत्तर न हुआ?’ युवती ने कहा।

सच बताओ तुम कौन हो? लपाती गाँव में तुम्हें कभी देखा नहीं।’

तताँरा मानो सम्मोहित था। उसके कानों में युवती की आवाज़ ठीक से पहुँच न सकी। उसने पुनः विनय की, ‘तुमने गाना क्यों रोक दिया? गाओ न?’

युवती झुँझला(चिड़, परेशान) उठी। वह कुछ और सोचने लगी। अंततः उसने निश्चयपूर्वक एक बार पुनः लगभग विरोध करते हुए कड़े स्वर में कहा।

‘ढीठता की हद है। मैं जब से परिचय पूछ रही हूँ और तुम बस एक ही राग अलाप रहे हो (एक ही बात बार-बार कहना। गीत गाओ-   गीत गाओ, आखिर क्यों? क्या तुम्हें गाँव का नियम नहीं मालूम?’ इतना बोलकर वह जाने के लिए तेज़ी से मुड़ी। तताँरा को मानो कुछ होश आया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह उसके सामने रास्ता रोककर, मानो गिड़गिड़ाने लगा। ‘मुझे माफ़ कर दो। जीवन में पहली बार मैं इस तरह विचलित(भावनाओं पर काबू नहीं) हुआ हूँ। तुम्हें देखकर मेरी चेतना(सोच-समझ) लुप्त हो गई थी। मैं तुम्हारा रास्ता छोड़ दूँगा। बस अपना नाम बता दो।’ तताँरा ने विवशता में आग्रह(निवेदन) किया। उसकी आँखें युवती के चेहरे पर केंद्रित थीं। उसके चेहरे पर सच्ची विनय थी। ‘वा--- मी--- रो--- ’ एक रस घोलती (मधुर) आवाज़ उसके कानों में पहुँची।

‘वामीरो--- वा--- मी--- रो--- वाह कितना सुंदर नाम है। कल भी आओगी न यहाँ?’ तताँरा ने याचना(प्रार्थना) भरे स्वर में कहा।

‘नहीं--- शायद--- कभी नहीं।’ वामीरो ने अन्यमनस्कतापूर्वक(ध्यान न देते हुए) कहा और झटके से लपाती की तरफ़ बेसुध-सी दौड़ पड़ी। पीछे तताँरा के वाक्य गूँज रहे थे।

‘वामीरो--- मेरा नाम तताँरा है। कल मैं इसी चान पर प्रतीक्षा करूँगा--- तुम्हारी बाट जोहूँगा (इंतज़ार करना ) --- ज़रूर आना---’

वामीरो रुकी नहीं, भागती ही गई। तताँरा उसे जाते हुए निहारता(मोहित होकर देखना) रहा।

वामीरो घर पहुँचकर भीतर ही भीतर कुछ बेचैनी(व्याकुलता) महसूस करने लगी। उसके भीतर तताँरा से मुक्त होने की एक झूठी छटपटाहट थी। एक झल्लाहट में उसने दरवाज़ा बंद किया और मन को किसी और दिशा में ले जाने का प्रयास किया। बार-बार तताँरा का याचना भरा चेहरा उसकी आँखों में तैर(सामने आना) जाता। उसने तताँरा के बारे में कई कहानियाँ सुन रखी थीं। उसकी कल्पना में वह एक अद्भुत साहसी युवक था। किंतु वही तताँरा उसके सम्मुख(सामने) एक अलग रूप में आया। सुंदर, बलिष्ठ किंतु बेहद शांत, सभ्य और भोला। उसका व्यक्तित्व कदाचित वैसा ही था जैसा वह अपने जीवन-साथी के बारे में सोचती रही थी। किंतु एक दूसरे गाँव के युवक के साथ यह संबंध परंपरा के विरुद्ध था। अतएव उसने उसे भूल जाना ही श्रेयस्कर (कल्याणकारी) समझा। किंतु यह असंभव जान पड़ा। तताँरा बार-बार उसकी आँखों के सामने था। निर्निमेष (बिना पलक झपकाए) याचक की तरह प्रतीक्षा में डूबा हुआ।

किसी तरह रात बीती। दोनों के हृदय व्यथित(दुःखी) थे। किसी तरह आँचरहित(ऊर्जा से रहित) एक ठंडा और ऊबाऊ(नीरस) दिन गुज़रने लगा। शाम की प्रतीक्षा थी। तताँरा के लिए मानो पूरे जीवन की अकेली प्रतीक्षा थी। उसके गंभीर और शांत जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था। वह अचंभित था, साथ ही रोमांचित भी। दिन ढलने के काफ़ी पहले वह लपाती की उस समुद्री चान पर पहुँच गया। वामीरो की प्रतीक्षा में एक-एक पल पहाड़ की तरह भारी  था। उसके भीतर एक आशंका भी दौड़ रही थी। अगर वामीरो न आई तो? वह कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा था। सिर्फ प्रतीक्षारत था। बस आस(आशा) की एक किरण थी जो समुद्र की देह पर डूबती किरणों की तरह कभी भी डूब सकती थी। वह बार-बार लपाती के रास्ते पर नज़रें दौड़ाता। सहसा(अचानक) नारियल के झुरमुटों में उसे एक आकृति कुछ साफ़ हुई--- कुछ और--- कुछ और। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा (बहुत प्रसन्न होना)। सचमुच वह वामीरो थी। लगा जैसे वह घबराहट में थी। वह अपने को छुपाते हुए बढ़ रही थी। बीच-बीच में इधर-उधर दृष्टि दौड़ाना (चारों तरफ देखना) न भूलती। फिर तेज़ कदमों से चलती हुई तताँरा के सामने आकर ठिठक गई (एकाएक रूक गई) । दोनों शब्दहीन(मूक, चुप) थे। कुछ था जो दोनों के भीतर बह रहा था। एकटक(लगातार) निहारते हुए वे जाने कब तक खड़े रहे। सूरज समुद्र की लहरों में कहीं खो गया था। अँधेरा बढ़ रहा था। अचानक वामीरो कुछ सचेत हुई और घर की तरफ़ दौड़ पड़ी। तताँरा अब भी वहीं खड़ा था--- निश्चल (बिना हिले) --- शब्दहीन---।

दोनों रोज़ उसी जगह पहुँचते और मूर्तिवत (बिना हिले-डुले) एक-दूसरे को निर्निमेष (एकटक) ताकते रहते। बस भीतर समर्पण था जो अनवरत (लगातार) गहरा रहा था। लपाती के कुछ युवकों ने इस मूक प्रेम को भाँप लिया (समझ लिया) और खबर हवा की तरह बह उठी। वामीरो लपाती ग्राम की थी और तताँरा पासा का। दोनों का संबंध संभव न था। रीति अनुसार दोनों को एक ही गाँव का होना आवश्यक था। वामीरो और तताँरा को समझाने-बुझाने के कई प्रयास हुए किंतु दोनों अडिग रहे। वे नियमतः लपाती के उसी समुद्री किनारे पर मिलते रहे। अफ़वाहें फैलती रहीं।

कुछ समय बाद पासा गाँव में ‘पशु-पर्व’ का आयोजन हुआ। पशु-पर्व में हृष्ट-फष्ट पशुओं के प्रदर्शन के अतिरिक्त पशुओं से युवकों की शक्ति परीक्षा प्रतियोगिता भी होती है। वर्ष में एक बार सभी गाँव के लोग हिस्सा लेते हैं। बाद में नृत्य-संगीत और भोजन का भी आयोजन होता है। शाम से सभी लोग पासा में एकत्रित(इकट्ठा) होने लगे। धीरे-धीरे विभिन्न कार्यक्रम शुरू हुए। तताँरा का मन इन कार्यक्रमों में तनिक (थोड़ा) न था। उसकी व्याकुल आँखें वामीरो को ढूँढ़ने में व्यस्त थीं। नारियल के झुंड के एक पेड़ के पीछे से उसे जैसे कोई झाँकता दिखा। उसने थोड़ा और करीब जाकर पहचानने की चेष्टा की। वह वामीरो थी जो भयवश सामने आने में झिझक (हिचक) रही थी। उसकी आँखें तरल थीं। होंठ काँप रहे थे। तताँरा को देखते ही वह फूटकर रोने लगी। तताँरा विह्वल (व्याकुल) हुआ। उससे कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था। रोने की आवाज़ लगातार ऊँची होती जा रही थी। तताँरा किंकर्तव्यविमूढ़ (दुविधा में) था। वामीरो के रुदन (रोना) स्वरों को सुनकर उसकी माँ वहाँ पहुँची और दोनों को देखकर आग बबूला (क्रोधित) हो उठी। सारे गाँववालों की उपस्थिति में यह दृश्य उसे अपमानजनक लगा। इस बीच गाँव के कुछ लोग भी वहाँ पहुँच गए। वामीरो की माँ क्रोध में उफन(भयंकर क्रोधित) उठी। उसने तताँरा को तरह-तरह से अपमानित किया। गाँव के लोग भी तताँरा के विरोध में आवाजें उठाने लगे। यह तताँरा के लिए असहनीय था। वामीरो अब भी रोए जा रही थी। तताँरा भी गुस्से से भर उठा। उसे जहाँ विवाह की निषेध (रोक) परंपरा पर क्षोभ (गुस्सा) था वहीं अपनी असहायता पर खीझ। वामीरो का दुख उसे और गहरा कर रहा था। उसे मालूम न था कि क्या कदम उठाना चाहिए? अनायास उसका हाथ तलवार की मूठ पर जा टिका। क्रोध में उसने तलवार निकाली और कुछ विचार करता रहा। क्रोध लगातार अग्नि की तरह बढ़ रहा था। लोग सहम उठे। एक सन्नाटा-सा खिंच गया। जब कोई राह न सूझी तो क्रोध का शमन (गुस्सा शांत करने) करने के लिए उसमें शक्ति भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा। वह पसीने से नहा उठा। सब घबराए हुए थे। वह तलवार को अपनी तरफ़ खींचते-खींचते दूर तक पहुँच गया। वह हाँफ रहा था। अचानक जहाँ तक लकीर खिंच गई थी, वहाँ एक दरार होने लगी। मानो धरती दो टुकड़ों में बँटने लगी हो। एक गड़गड़ाहट-सी गूँजने लगी और लकीर की सीध में धरती फटती ही जा रही थी। द्वीप के अंतिम सिरे तक तताँरा धरती को मानो क्रोध में काटता जा रहा था। सभी भयाकुल हो उठे। लोगों ने ऐसे दृश्य की कल्पना न की थी, वे सिहर (काँप) उठे। उधर वामीरो फटती हुई धरती के किनारे चीखती हुई दौड़ रही थी - तताँरा--- तताँरा--- तताँरा उसकी करुण चीख मानो गड़गड़ाहट में डूब गई। तताँरा दुर्भाग्यवश दूसरी तरफ़ था। द्वीप के अंतिम सिरे तक धरती को चाकता (लकीर खींचता) वह जैसे ही अंतिम छोर (किनारा) पर पहुँचा, द्वीप दो टुकड़ों में विभक्त(बँट) हो चुका था। एक तरफ़ तताँरा था दूसरी तरफ़ वामीरो। तताँरा को जैसे ही होश आया, उसने देखा उसकी तरफ़ का द्वीप समुद्र में धँसने लगा है। वह छटपटाने लगा उसने छलाँग लगाकर दूसरा सिरा थामना चाहा किंतु पकड़ ढीली पड़ गई। वह नीचे की तरफ़ फिसलने लगा। वह लगातार समुद्र की सतह की तरफ़ फिसल रहा था। उसके मुँह से सिर्फ एक ही चीख उभरकर डूब रही थी, ‘वामीरो--- वामीरो--- वामीरो--- वामीरो---’ उधर वामीरो भी ‘तताँरा--- तताँरा--- ता--- ताँ--- रा’ पुकार रही थी।

तताँरा लहूलुहान (खून से लथपथ) हो चुका था--- वह अचेत(बेहोश) होने लगा और कुछ देर बाद उसे कोई होश नहीं रहा। वह कटे हुए द्वीप के अंतिम भूखंड पर पड़ा हुआ था जो कि दूसरे हिस्से से संयोगवश(इत्तेफाक से) जुड़ा था। बहता हुआ तताँरा कहाँ पहुँचा, बाद में उसका क्या हुआ कोई नहीं जानता। इधर वामीरो पागल हो उठी। वह हर समय तताँरा को खोजती हुई उसी जगह पहुँचती और घंटों बैठी रहती। उसने खाना-पीना छोड़ दिया। परिवार से वह एक तरह विलग(अलग) हो गई। लोगों ने उसे ढूँढ़ने की बहुत कोशिश की किंतु कोई सुराग न मिल सका।

आज न तताँरा है न वामीरो किंतु उनकी यह प्रेमकथा घर-घर में सुनाई जाती है। निकोबारियों का मत है कि तताँरा की तलवार से कार-निकोबार के जो टुकड़े हुए, उसमें दूसरा लिटिल अंदमान है जो कार-निकोबार से आज 96 कि.मी. दूर स्थित है। निकोबारी इस घटना के बाद दूसरे गाँवों में भी आपसी वैवाहिक संबंध करने लगे। तताँरा-वामीरो की त्यागमयी मृत्यु शायद इसी सुखद परिवर्तन के लिए थी।


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द्वारा :- www.hindiCBSE.com
आभार: एनसीइआरटी (NCERT) Sparsh Part-2 for Class 10 CBSE


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