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वैज्ञानिक चेतना के वाहक:चंद्रशेखर वेंकट रामन्



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 पेड़ से सेब गिरते हुए तो लोग सदियों(सैंकड़ो वर्षोँ) से देखते आ रहे थेमगर गिरने के पीछे छिपे रहस्य(भेद) को न्यूटन से पहले कोई और समझ नहीं पाया था। ठीक उसी प्रकार विराट(विशाल) समुद्र की नील-वर्णीय (नीले रंग) आभा(चमक) को भी असंख्य(अनगिनत) लोग आदिकाल(बहुत पहले से) से देखते आ रहे थेमगर इस आभा(चमक) पर पड़े रहस्य के परदे को हटाने के लिए हमारे समक्ष(सामने) उपस्थित हुए सर चंद्रशेखर वेंकट रामन्।

      बात सन् 1921 की हैजब रामन् समुद्री यात्रा पर थे। जहाज के डेक(समुद्री जहाज की ऊपरी सतह) पर खड़े होकर नीले समुद्र को निहारना(सुन्दरता की सराहना करते हुए देखना)प्रकृति-प्रेमी रामन् को अच्छा लगता था। वे समुद्र की नीली आभा में घंटों खोए रहते। लेकिन रामन् केवल भावुक(भावना से भरे) प्रकृति-प्रेमी ही नहीं थे। उनके अंदर एक वैज्ञानिक की जिज्ञासा(जानने की इच्छा)  भी उतनी ही सशक्त(मज़बूत)  थी। यही जिज्ञासा उनसे सवाल कर बैठी- ‘आखिर समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता हैकुछ और क्यों नहीं?’  रामन् सवाल का जवाब ढूँढ़ने में लग गए। जवाब ढूँढ़ते ही वे विश्वविख्यात(विश्वप्रसिद्ध)  बन गए। रामन् का जन्म 7 नवंबर सन्1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में हुआ था। इनके पिता विशाखापत्तनम् में गणित और भौतिकी(फिजिक्स) के शिक्षक थे। पिता इन्हें बचपन से गणित और भौतिकी पढ़ाते थे। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि जिन दो विषयों के ज्ञान ने उन्हें जगत-प्रसिद्ध(संसार में प्रसिद्ध)  बनाया,उनकी सशक्त(मज़बूत) नींव(आधार) उनके पिता ने ही तैयार की थी। कॉलेज की पढ़ाई उन्होंने पहले ए.बी.एन. कॉलेज तिरुचिरापल्ली से और फिर प्रेसीडेंसी कॉलेजमद्रास से की। बी.ए. और एम.ए. - दोनों ही परीक्षाओं में उन्होंने का़फी ऊँचे अंक हासिल किए।

     रामन् का मस्तिष्क विज्ञान के रहस्यों को सुलझाने के लिए बचपन से ही बेचैन रहता था। अपने कॉलेज के ज़माने(समय) से ही उन्होंने शोधकार्यों में(खोज के कार्यों) दिलचस्पी(रुचि)  लेना शुरू कर दिया था। उनका पहला शोधपत्र फिलॉसॉफिकल मैगजीन (विश्व के वैज्ञानिकों द्वारा निकाले जानेवाली एक पत्रिका) में प्रकाशित(छपा) हुआ था। उनकी दिली(मन की) इच्छा तो यही थी कि वे अपना सारा जीवन शोधकार्यों को ही समर्पित कर देंमगर उन दिनों शोधकार्य को पूरे समय के केरियर के रूप में अपनाने की कोई खास व्यवस्था नहीं थी। प्रतिभावान(अद्भुत बौद्धिक क्षमता से पूर्ण) छात्र सरकारी नौकरी की ओर आकर्षित होते थे। रामन् भी अपने समय के अन्य सुयोग्य छात्रों की भाँति भारत सरकार के वित्त-विभाग(finance-Department) में अफ़सर बन गए। उनकी तैनाती ‘कलकत्ता’ में हुई।

     कलकत्ता (वर्तमान नाम कोलकाता’ है।में सरकारी नौकरी के दौरान उन्होंने अपने स्वाभाविक रुझान(रूचि) को बनाए रखा। दफ्तर से फुर्सत(छुटकारा) पाते ही वे लौटते हुए बहू  आतेजहाँ ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़  साइंस’ की प्रयोगशाला थी। यह अपने आपमें एक अनूठी(अपनी तरह की अकेली) संस्था थीजिसे कलकत्ता के एक डॉक्टर महेंद्रलाल सरकार ने वर्षों की कठिन मेहनत और लगन के बाद खड़ा किया था। इस संस्था का उद्देश्य था देश में वैज्ञानिक चेतना(awareness, जागर्ति)  का विकास करना। अपने महान् उद्देश्यों के बावजूद इस संस्था के पास साधनों का नितांत अभाव था। रामन् इस संस्था की प्रयोगशाला में कामचलाऊ(किसी भी प्रकार से काम करने के योग्य) उपकरणों(साधनों)  का इस्तेमाल(प्रयोग) करते हुए शोधकार्य करते। यह अपने आपमें एक आधुनिक हठयोग(हठ यानि ज़िदढृढ़-प्रतिज्ञ)  का उदाहरण थाजिसमें एक साधक (मेहनत करनेवाला) दफ्तर में कड़ी मेहनत के बाद बहू बाजार(कोलकाता का एक बाज़ार)  की इस मामूली-सी(कम महत्त्व की) प्रयोगशाला में पहुँचता और अपनी इच्छाशक्ति के जोर से भौतिक विज्ञान को समृद्ध(उन्नत) बनाने के प्रयास करता। उन्हीं दिनों वे वाद्ययंत्रों(बज़ानेवाले यंत्रों)   की ओर आकृष्ट(आकर्षित) हुए। वे वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के पीछे छिपे वैज्ञानिक रहस्यों की परतें खोलने (छिपे भेद का पता लगाना) का प्रयास कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने अनेक वाद्ययंत्रों का अध्ययन किया जिनमें देशी(देश में बनें) और विदेशी(परदेश में बनें)दोनों प्रकार के वाद्ययंत्र थे।

      वाद्ययंत्रों पर किए जा रहे शोधकार्यों के दौरान उनके अध्ययन के दायरे(सीमा) में जहाँ वायलिनचौलो या पियानो जैसे विदेशी वाद्य आएवहीं वीणातानपूरा और मृदंगम् (भारतीय वाद्ययंत्र) पर भी उन्होंने काम किया। उन्होंने वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर पश्चिमी देशों की इस भ्रांति(अयथार्थ ज्ञान) को तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्यों की तुलना में घटिया(निम्न स्तर के) हैं। वाद्ययंत्रों के कंपन (vibrations) के पीछे छिपे गणित पर उन्होंने अच्छा-खासा काम किया और अनेक शोधपत्र भी प्रकाशित किए।

     उस ज़माने के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी को इस प्रतिभावान युवक के बारे में जानकारी मिली। उन्हीं दिनों कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर का नया पद सृजित(बना) हुआ था। मुखर्जी महोदय ने रामन् के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे सरकारी नौकरी छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर का पद स्वीकार कर लें। रामन् के लिए यह एक कठिन निर्णय था। उस ज़माने के हिसाब से वे एक अत्यंत प्रतिष्ठित(इज़्ज़तदार)  सरकारी पद पर थेजिसके साथ मोटी तनख्वाह(वेतन) और अनेक सुविधाएँ जुड़ी हुई थीं। उन्हें नौकरी करते हुए दस वर्ष बीत चुके थे। ऐसी हालत में सरकारी नौकरी छोड़कर कम वेतन और कम सुविधाओंवाली विश्वविद्यालय की नौकरी में आने का फैंसला करना हिम्मत का काम था।

      रामन् सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को छोड़ सन् 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की नौकरी में आ गए। उनके लिए सरस्वती की साधना (ज्ञान प्राप्ति के लिए मेहनत) सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के शैक्षणिक(शिक्षा से भरे) माहौल(वातावरण) में वे अपना पूरा समय अध्ययन(पढ़ने)अध्यापन(पढ़ाने) और शोध(खोजी कार्यों) में बिताने लगे। चार साल बाद यानी सन् 1921 में समुद्र-यात्रा के दौरान जब रामन् के मस्तिष्क में समुद्र के नीले रंग की वज़ह(कारण) का सवाल हिलोरें(बार-बार आना) लेने लगातो उन्होंने आगे इस दिशा में प्रयोग किएजिसकी परिणति(परिणाम) रामन् प्रभाव (प्रकाश के रंगों में परिवर्तन के कारणों से सम्बन्धित नियम)  की खोज के रूप में हुई।

      रामन् ने अनेक ठोस रवों (खुरदरी) और तरल पदार्थों पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि जब एकवर्णीय (एक रंग की) प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके वर्ण(रंग) में परिवर्तन आता है। वजह(कारण) यह होती है कि एकवर्णीय(एक रंग के) प्रकाश की किरण के फोटॉन(प्रकाश के कण) जब तरल(द्रव) या ठोस रवे से गुजरते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो इस टकराव के परिणामस्वरूप वे या तो ऊर्जा का कुछ अंश(हिस्सा) खो देते हैं या पा जाते हैं। दोनों ही स्थितियाँ प्रकाश के वर्ण (रंग) में बदलाव लाती हैं। एकवर्णीय प्रकाश की किरणों में सबसे अधिक ऊर्जा(एनर्जी) बैंजनी रंग के प्रकाश में होती है। बैंजनी के बाद क्रमशः (क्रम के अनुसार) नीलेआसमानीहरेपीलेनारंगी और लाल वर्ण(रंग) का नंबर आता है। इस प्रकार लाल-वर्णीय प्रकाश की ऊर्जा सबसे कम होती है। एकवर्णीय प्रकाश तरल या ठोस रवों से गुजरते हुए जिस परिमाण(मात्रा) में ऊर्जा खोता या पाता हैउसी हिसाब से उसका वर्ण(रंग) परिवर्तित(बदल) हो जाता है। 

       रामन् की खोज भौतिकी के क्षेत्र में एक क्रांति(भारी फेर-बदल) के समान थी। इसका पहला परिणाम तो यह हुआ कि प्रकाश की प्रकृति के बारे में आइंस्टाइन के विचारों का प्रायोगिक(प्रयोग पर आधारित) प्रमाण(सबूत) मिल गया। आइंस्टाइन के पूर्ववर्ती(पहले के) वैज्ञानिक प्रकाश को तरंग(wave) के रूप में मानते थेमगर आइंस्टाइन ने बताया कि प्रकाश अति सूक्ष्म(बारीक) कणों की तीव्र धारा(प्रवाह) के समान है। इन अति सूक्ष्म कणों की तुलना आइंस्टाइन ने बुलेट से की और इन्हें ‘फोटॉन(प्रकाश के कण) नाम दिया। रामन् के प्रयोगों ने आइंस्टाइन की धारणा(विचारधारा) का प्रत्यक्ष प्रमाण दे दियाक्योंकि एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन यह साफतौर पर प्रमाणित करता है कि प्रकाश की किरण तीव्रगामी सूक्ष्म कणों के प्रवाह के रूप में व्यवहार करती है। रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना(भीतर की बनावट) का अध्ययन सहज हो गया। पहले इस काम के लिए इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी(इंफ्रारेड की किरणों पर आधारित स्पेक्ट्रोस्कोपीका सहारा लिया जाता था। यह मुश्किल तकनीक है और गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती है। रामन् की खोज के बाद पदार्थों की आणविक और परमाणविक संरचना के अध्ययन के लिए रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी (प्रकाश की किरणों पर आधारित) का सहारा लिया जाने लगा। यह तकनीक एकवर्णीय (एक रंग के) प्रकाश के वर्ण(रंग) में परिवर्तन के आधार परपदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक(एकदम सही) जानकारी देती है। इस जानकारी की वजह से पदार्थों का संश्लेषण(पदार्थ किनसे मिलकर बना है) प्रयोगशाला में करना तथा अनेक उपयोगी पर्दाथों का कृत्रिम(अप्राकृतिक)  रूप से निर्माण(बनाना) संभव हो गया है।

       रामन् प्रभाव की खोज ने रामन् को विश्व के चोटी(उच्च श्रेणी) के वैज्ञानिकों की पंक्ति(कतार) में ला खड़ा किया। पुरस्कारों और सम्मानों की तो जैसे झड़ी-सी लगी रही। उन्हें सन् 1924 में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता से सम्मानित किया गया। सन् 1929 में उन्हें सर’ की उपाधि प्रदान की गई। ठीक अगले ही साल उन्हें विश्व के सर्वोच्च पुरस्कार - भौतिकी में नोबेल पुरस्कारसे सम्मानित किया गया। उन्हें और भी कई पुरस्कार मिलेजैसे रोम का मेत्यूसी पदकरॉयल सोसाइटी का ह्यूज पदकफि़लोडेल्फि़या इंस्टीट्यूट का फ्रैंकलिन पदकसोवियत रूस का अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार आदि। सन् 1954 में रामन् को देश के सर्वोच्च सम्मान भारत-रत्न से सम्मानित किया गया। वे नोबेल पुरस्कार पानेवाले पहले भारतीय वैज्ञानिक थे। उनके बाद यह पुरस्कार भारतीय नागरिकतावाले किसी अन्य वैज्ञानिक को अभी तक नहीं मिल पाया है। उन्हें अधिकांश सम्मान उस दौर में मिले जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था। उन्हें मिलनेवाले सम्मानों ने भारत को एक नया आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास दिया। विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने एक नयी भारतीय चेतना(awareness) को जाग्रत किया। भारतीय संस्कृति से रामन् को हमेशा ही गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को हमेशा अक्षुण्ण(सदा बनाये) रखा। अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि के बाद भी उन्होंने अपने दक्षिण भारतीय पहनावे(परिधान) को नहीं छोड़ा। वे कट्टर(विशुद्ध) शाकाहारी थे और मदिरा(शराब) से सख्त परहेज़ रखते थे। जब वे नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने स्टाकहोम गए तो वहाँ उन्होंने अल्कोहल पर रामन् प्रभाव का प्रदर्शन किया। बाद में आयोजित पार्टी में जब उन्होंने शराब पीने से इंकार किया तो एक आयोजक ने परिहास(मज़ाक) में उनसे कहा कि रामन् ने जब अल्कोहल पर रामन् प्रभाव का प्रदर्शन कर हमें आनन्दित(खुश करने में) करने में कोई कसर(कमी) नहीं छोड़ीतो रामन् पर अल्कोहल के प्रभाव का प्रदर्शन(दिखाने) करने से परहेज़ क्यों?

     रामन् का वैज्ञानिक व्यक्तित्व प्रयोगों और शोधपत्र-लेखन तक ही सिमटा हुआ नहीं था। उनके अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी और वे देश में वैज्ञानिक दृष्टि(विज्ञान के नियमों में रखकर देखना) और चिंतन (विज्ञान के नियमों के अनुसार सोच) के विकास के प्रति समर्पित थे। उन्हें अपने शुरुआती दिन हमेशा ही याद रहे जब उन्हें ढंग की प्रयोगशाला और उपकरणों के अभाव(कमी) में का़फी संघर्ष करना पड़ा था। इसीलिए उन्होंने एक अत्यंत उन्नत प्रयोगशाला और शोध-संस्थान की स्थापना की जो बंगलोर में स्थित है और उन्हीं के नाम पर ‘रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट’ नाम से जानी जाती है। भौतिक शास्त्र में अनुसंधान(खोज़) को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने इंडियन जरनल ऑफ फिजिक्स नामक शोध-पत्रिका प्रारंभ की। अपने जीवनकाल में उन्होंने सैकड़ों शोध-छात्रों का मार्गदर्शन किया। जिस प्रकार एक दीपक से अन्य कई दीपक जल उठते हैंउसी प्रकार उनके शोध-छात्रों ने आगे चलकर का़फी अच्छा काम किया। उन्हीं में कई छात्र बाद में उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हुए। विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए वे करेंट साइंस नामक एक पत्रिका का भी संपादन करते थे। रामन् प्रभाव केवल प्रकाश की किरणों तक ही सिमटा नहीं थाउन्होंने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से पूरे देश को आलोकित और प्रभावित किया। उनकी मृत्यु 21 नवंबर सन् 1970 के दिन 82 वर्ष की आयु में हुई।

      रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा ही यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन(जाँच-पड़ताल) एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें। तभी तो उन्होंने संगीत के सुर-ताल और प्रकाश की किरणों की आभा के अंदर से वैज्ञानिक सिद्धांत खोज निकाले। हमारे आसपास ऐसी न जाने कितनी ही चीजें बिखरी पड़ी हैंजो अपने पात्र(योग्य व्यक्ति) की तलाश में हैं। ज़रूरत है रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने की और प्रकृति के बीच छुपे वैज्ञानिक रहस्य का भेदन करने (पता लगाने) की।


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द्वारा :- hindiCBSE.com
आभार: एनसीइआरटी (NCERT) Sparsh Part-1 for Class 9 CBSE                          

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