आशुभाषण :युवा शक्ति ही भारत को बदल सकती है

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आदरणीय अध्यक्ष महोदय, सम्माननीय शिक्षकगण व मेरे प्रिय मित्रो !

युवा शक्ति ही भारत को बदल सकती है - यह आज सदन द्वारा आशुभाषण के लिए दिया गया विषय है।
क्या हमारे देश में युवा होते हैं ? पिछले कई सालों से देख रहा हूँ कि हमारे देशमें युवा ही नहीं बच्चा भी  नहीं हो रहा है। क्योंकि जब बच्चा अपनी उम्र से बड़े काम करता हैं तो हम कहते हैं कितना होनहार बालक है और गर्व करते हैं कि हमारी यह संतान कितनी होनहार है। बेचारा आज का बच्चा जो यह भी नहीं जानता कि पेड़ से फल तोड़कर खाने से भी अधिक आनन्द है पेड़पर चढ़कर फल तोड़ने में है। जिस  देश में बच्चा बचपन को ही न जान पाए वह अपने युवापन को क्या जानेगा। पिछले कई सालों से युवा-अपराध बढ़े हैं ? सबसे बड़ा कारण है टी वी, मोबाइल और कम्प्यूटर। हम सामाजिक नहीं रहे। हमें टीवी या कम्प्यूटर के सामने बैठना अधिक अच्छा लगता है और जब इनसे फ्री हुए तो मोबाइल पर लगे रहना अच्छा लगता है। काम की वह शक्ति जो अपने पालनहारों की मर्यादा को सहज ही नष्ट कर देती है उसके वशीभूत युवा-वर्ग ‘ कैश और ऐश’ की सीमा से परे नहीं सोच पाता है ऐसे में समाज में  बदलाव हो रहे हैं, युवा-अपराध बढ़ रहे हैं; देश का चारित्रिक पतन हो रहा है; और तो और कल के यही युवा आज देश के कर्णधार बने देश को पतन की ओर ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

फिर, युवाशक्ति कौन-सी है? एक वह है जो मन से युवा है, और एक वह है जो तन से युवा है। किसकी बात करेंगे आप ! युवाशक्ति ही भारत को बदल सकती है- ऐसा नहीं है। युवाशक्ति ही भारत को बदल रही है। संस्कार का दामन त्यागकर पाश्चात्य देशों की राह चलना शान की बात है- भारत बदला है; गर्लफ्रेंड या बाॅयफ्रेंड या फिर लिव-इन रिलेशनशिप की संस्कृति का आना - भारत बदला है; वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ी है, शिशु-सुधार गृह बढ़े हैं, सामाजिक मान्यताएँ धूल चाट रही हैं क्योंकि युवा शक्ति ही भारत को बदल सकती है। क्यों न एक विचारधारा पैदा की जाए, क्यों न कहा जाए कि यह हमारी संस्कृति का संक्रमण काल है। 1947 से लेकर आज तक चरित्र के उत्थान के लिए कोई नीति नहीं बनी, परिणाम सामने है। कविवर ओमप्रकाश आदित्य की कविता के बोल याद आते हैं - इधर भी गधे हैं उधर भी गधे हैं, जिधर देखता हूँ गधे ही गधे हैं; घोड़ों को मिलती नहीं घास देखो, गधे खा रहे च्यवनप्राश देखो।

दोस्तों, ताली एक हाथ से नही बजती। सिर्फ युवाओं के पास ताकत है तो उम्रदराजों के पास अनुभव जिनका आपसी तालमेल ही भारत को बदल सकता है। आवश्यकता है कि उम्रदराजों के अनुभवों को प्राप्त कर युवा आगे बढ़े तब ही भारत बदल सकता है।

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आदरणीय अध्यक्ष महोदय, सम्माननीय शिक्षकगण व मेरे प्रिय मित्रो !

युवा शक्ति ही भारत को बदल सकती है - यह आज सदन द्वारा आशुभाषण के लिए दिया गया विषय है।


नई सोच को राह मिलना आसान नहीं होता,
पिता की अंगुली पकड़कर चलना भले ही सीखा हो,
पर अपनी राह बनाना आसान नहीं होता।
चुनौतियाँ हर कदम पर पलक बिछाएँ बैठी हैं,
अकेले चलने का सफर आसान नहीं होता,
क्यों बाँटते हो पहचान अलग हो जड़ों से,
बिन तराशे तो पत्थर भी भगवान नहीं होता।
मित्रों, युवाशक्ति ही भारत को बदल सकती है तो क्या आज तक भारत में कभी युवा पैदा ही नहीं हुए ! बचपन से सीधे बुढ़ापा। बहुत खतरनाक छलांग है। मुझे नहीं लगता आजतक कभी किसी ने लगाई होगी। और किसी ने लगाई भी होगी तो वह अपने पैरों पर नहीं चार कंधों पर ही घर गया होगा। श्रीमान, अनुभव भी कोई चीज होती है। यह आइंस्टीन के सिर पर पड़ा नारियल नहीं होती कि धमाक से गिरा और  ग्रेविटेशन फोर्स का सिद्धांत निकल आया। सिर पर पड़े तो सीधे जन्नती दरवाजा खोल देती है। अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छक्के इस अनुभव नाम की चिड़िया ने छुड़ा दिए हैं। और, यही वह चीज है जिसका युवाओं के पास अभाव होता है। जिनके पास अनुभव होता है वह बुद्धि, धैर्य, चातुर्य और कुशलता का स्वामी होता है। मत भूलो कि हुमायूं को रेगिस्तान की धूल फाँकनी पड़ी थी और चाणक्य ने बिना सेना के तख्ता पलट कर दिया था।
जीवन क्रिकेट का मैदान भी नहीं है। युवा जब तक अधूरा है जब तक उसमें धैर्य न हो। यहाँ तो पता ही नहीं लगता कि किसने बाॅल फेंकी और किसने छक्का मारा और किसने कैच लपक लिया। क्रिकेट में गिरते हैं तो झाड़-पौंछ कर खड़े होने की गुंजाइश तो रहती है पर जीवन में गिरने पर सीधे हरिद्वार का रास्ता ही दिखाई देता है।
कोई सन्देह नहीं है मुझे, कि युवा शक्ति ही भारत को बदल सकती है। इसमें इतना-सा और जोड़ना चाहूंगा कि अपने से बड़ों का आशीर्वाद लेकर चले तो युवा शक्ति ही भारत को बदल सकती है। उसमें कुछ कर गुजरने का जज़्बा है, कुछ कर दिखाने की ताकत है वह नदियों की राह मोड़ सकता है, पहाड़ों का सीना चीर सकता है, समुद्र पर बाँध बना सकता है, आसमान में सूराख कर सकता है। इतिहास गवाह है कि युवाओं ने भारत का वक्त साधा है। स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, राजगुरु, भगतसिंह, सुखदेव आदि कितने ही नाम है जिन्होंने भारत को जिंदा रखा है और आज भी प्रेरणा दे रहे हैं।

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