सोशल मीडिया युवा पीढ़ी की पाठशाला है।


social Media yuva peedhee ki pathshala hai
सोशल मीडिया युवा पीढ़ी की पाठशाला है। (पक्ष)
गाँव की युवती के हाथ में मोबाइल देखता हूँ, लगता है, ज़माना बदल रहा है; बाजार में सब्जी बेचती या झाडू लगाती महिला के हाथ में मोबाइल देखता हूँ, लगता है ज़माना बदल रहा है; पहले जिन्हें गिनती भी ठीक से नहीं आती थी, उन्हें आज मोबाइल के ज़रिए सामान खरीदने और बेचने काम करते देखता हूँ, लगता है, ज़माना बदल रहा है। मेरा मत है, यदि किसी घर की नारी में परिवर्तन रहा है, तो अवष्य ही उस समाज में, उस देश की युवा पीढ़ी में भी परिवर्तन आएगा।

पहले टी वी देखने के लिए लोग पागल थे, उसके पहले रेडियो था तो उसे सुनने के लिए लोग पागल थे, आज यह दीवानगी मोबाइल के साथ जुड़ गई है। पहले लगता था, फ़िल्में युवाओं को बिगाड़ती हैं और आज फ़िल्मों के लिए कहकर सोशल मीडिया के लिए ऐसा कहा जा रहा है। तो हर युवा गंदा है और ही हर युवा आवारा या भटका हुआ। यदि ऐसा होता तो तो हम मंगल पर पहुँचते, ही मेट्रो में सफ़र कर रहे होते और ही सुन्दर-सुन्दर इमारतें देखने में आती।

हम युवा मानते किसे हैं? एक बीस से 40 साल का इंसान जो भले ही शरीर से युवा पर मन से वृद्ध हो गया हो या फिर एक 60 साल का आदमी जिसका शरीर भले ही कमजोर हो पर मन आज भी नए रहस्यों को अनावृत्त करने के लिए हिलोर मारता हो। वह हर व्यक्ति युवा है, जो दस साल का हो या 60 का पर जिसके मन में ताज़गी है, आगे बढ़ने का जुनून है, कुछ कर दिखाने के लिए भुजाओं में फड़कन है।

सामाजिक होना बुरी बात नहीं है, उसके लिए सोशल मीडिया तो एक माध्यम है। पहले हम पत्रों के माध्यम से सोशल होते थे आज सोशल मीडिया के माध्यम से। बुराई मीडिया में नहीं, उसके प्रयोग में है।  बुराई सोशल मीडिया में नहीं अपितु हमारी भूमिका में है, बुराई पात्रता और अपात्रता में है। किसे कितनी स्वतंत्रता देनी है, यह कार्य युवाओं का नहीं, उनका है, जिन्हें युवाओं को भविष्य के लिए सँवारना है।  क्या हमारे माता-पिता यह नहीं जानते कि हम सोशल मीडिया का प्रयोग किस प्रकार से कर रहे हैं? क्या हम स्वयं नहीं जानते कि सोशल मीडिया का प्रयोग हमारे द्वारा किस प्रकार से किया जा रहा है? जानबूझकर गलत रास्ते पर चलना हम तय करते हैं।

साध्य और साधन जिस पीढ़ी के जीवन में यदि स्पष्ट नहीं है तो वह पीढ़ी भटकाव की ओर ही जाती है और युवाओं को इसका दर्शन कराने की जिम्मेदारी पूर्व पीढ़ी की है। ऐसा नहीं है, सोशल मीडिया सामाजिक बुराई का रूप ले रहा है, वह रास्ता दिखाने का भी काम करता है, वह एक का दूसरे से मदद माँगने में सहयोग करता है, वह लोगों को आपस में जोड़ने का माध्यम है। किस उम्र और किस प्रकार के लोग उस माध्यम का उपयोग किस प्रकार कर रहे हैं- वह जाँचने योग्य विषय हो सकता है परन्तु सोशल मीडिया युवा पीढ़ी की पाठशाला  है - इसके प्रति रत्ती भर संदेह नहीं है।

स्काईप, विडियो चैट, फेसबुक, लिंकडेन, स्नैपचैट, व्हाट्सअप आदि अनेक सोशल मीडिया के वे माध्यम हैं जिनके द्वारा बॉस और सहायक, मित्र और मित्र, शिक्षक और छात्र, माता-पिता और संतान आपस में एक दूसरे से जुड़े भी रहते हैं और रास्ता दिखाने का काम भी सहजता से करते हैं। ऐसी वस्तुस्थिति में सोशल मीडिया युवा पीढ़ी की पाठशाला बनकर ही सामने आता है।


सोशल मीडिया युवा पीढ़ी की पाठशाला नहीं है। (विपक्ष)

पाठ पढ़ाने की शाला पाठशाला होती है- यह बताने की आवश्यकता नहीं है। ध्यान देनेवाली बात है कि हम पाठ किस का पढ़ रहे हैं? और पाठ में क्या पढ़ रहे हैं?

जो पाठ किसी को जिम्मेदार नागरिक बनकर पढ़ना है, उसे हम गैर जिम्मेदार युवा बनकर पढ़ेंगें तो समाज के वातावरण की कल्पना सहज ही की जा सकती है। पिछले दस सालों में जितनी वृद्धि युवा अपराधियों की संख्या में हुई है, जितने मानसिक विकार युवाओं में पैदा हुए हैं, उतने कभी पहले नहीं थे। यदि यह कि इन अपराधों के होने में सोशल मीडिया की भूमिका है- तो यह बात बेमानी-सी लगती है। पर, यदि यह कहूँ कि सोशल मीडिया ने समाज के स्तर को गिरने से बचाने के लिए कार्य किया है- तो निष्चय ही यह कथन सत्य नहीं है। सोशल मीडिया समाज के स्तर को गिरने से बचाने का कार्य कर सकती है, पर ऐसा किया नहीं जा रहा है।

सेल्फी लेने और उसके आदान-प्रदान करने का पाठ युवाओं मध्य सोशल मीडिया के द्वारा खूब पढ़ा जा रहा है, उस पाठ में सेल्फी कैसे ली जाए भले ही उसके लिए प्राणों पर भी बन आए! कैसा पाठ है यह? फ़ोटो चाहे जैसी हो या ख़बर चाहे कैसी भी हो लाइक का बटन दबाने में चूक नहीं होनी चाहिए। सेल्फी-मशविरा तो इस प्रकार से देंगे कि बस हमसे बड़ा रायचंद हो ही नहीं सकता है। कुछ समय पहले एक गधे के साथ में एक युवती की सेल्फी वायरल हुई थी। गधा भी पूरे फेस पर लुक देता हुआ कि आज मेरे भाग्य बदल गए, उस सेल्फी में दिखाई दे रहा था। मैं तो समझ ही नहीं पाया कि दाद किसे दूँ? आती हुई ट्रेन के सामने सेल्फी लेकर बहुत शान-से भेजी जाती है और उससे भी ज्यादा शान से उसे लाइक किया जाता है। वाह! दाद देनी चाहिए ऐसे युवाओं की भी उनके ऐसे साहसिक कार्यों की भी कि वे सेल्फी के लिए ट्रेन के आगे प्राण संकट में डालने के लिए तैयार हैं परन्तु किसी असहाय को सताया हुआ जानकर उसकी सहायता के लिए आगे आने को तैयार नहीं हैं!

भला हो इस व्हाट्सअप का। पहले फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे एप्प युवाओं के मार्गदर्शन के लिए ना-काफी थे इसलिए व्हाट्सअप धरती पर अवतरित हुआ। खैर, हर युवा के हाथ में मोबाइल तो देखने में आता है पर कोई नॉवेल या पढ़ाई की कोई पुस्तक नहीं दिखती। किसी ग्रुप का एडमिन बन जाने से बड़ी मज़ेदार पोस्ट तो दुनिया में हो ही नहीं सकती। एडमिन नहीं हो तो किसी ग्रुप का सदस्य ही बन जाओ। ऐसे बनकर तो हर युवा को यूँ ही लगता है कि बस कर ली दुनिया मुट्ठी में। वह भूल जाता है कि दुनिया पर राज कर सकता था पर वह खुद बे-काम होकर, मुट्ठी की मिट्टी बन गया है जो आँखों में धूल तो झोंक सकती है परन्तु किसी पौधे को पनपा नहीं सकती; वह हवा के बहाव के साथ उड़ तो सकती है, पर स्थिर होकर नींव नहीं बन सकती हैं। युवाओं को भी समझना चाहिए कि वे देश के ऐसे कुसुम हैं जिनसे ज़माना महकता है पर इस सोशल मीडिया की ज़र्द में वे ज़माने में बहकते दिखाई दे रहे हैं।

आजकल साहित्य का ज़माना, देशभक्ति का ज़माना नही रहा। आज ज़माना ही सोशल मीडिया का है और उसमें और उस पर दोनों में ही विशेष प्रकार की राजनीति है। पहले माइक पर भाषण होता था, भीड़ सामने होती थी, लोग सुनने के लिए आते थे कुछ सवाल-ज़वाब भी हो जाते थे पर आज बाल सँवारों और मोबाइल का विडियो बटन दबाओ, अच्छा-सा वक्तव्य, जिसमें किसी बुराई की बात का अंश आवश्यक है, दे डालो और फिर सेंड कर दो। किसी को पप्पू बना दो या पप्पू का बतंगड़ बना दो, बात वहीं की वहीं रह जाती है। भले ही नाम में क्या रखा है, पप्पू कहने से सारे युवाओं की पहचान नष्ट नहीं हो जाती और पप्पू को पप्पू कहने से सारे युवा पप्पू नहीं हो जाते हैं। सारे सद्दामसद्दामनहीं हो गए। राजनीतिक सोशल मीडिया में यह पप्पू शब्द सर्वाधिक चर्चित हो गया है। गूगल पर टाइप करो किहू इज पप्पू ऑफ़ इंडिया वह भी जवाब दे देता है। क्या यह हमारे लिए शान की बात है कि हमने अपने सोशल मीडिया के ज़रिए अपने ही एक युवा को ऐसा इंटरनेशनल स्टार बना दिया?

जब अपने आस-पास के हालात ऐसे पाता हूँ तब कहा नहीं जाता कि सोशल मीडिया युवा पीढ़ी की पाठशाला है। राजनीति की अच्छी बातें, प्रेरणा देने वाले संस्मरण, प्रेरणा देने वाली घटनाएँ, शिक्षा प्रद बातें ट्रोल नहीं होती हैं पर आँख मारने का विडियो वायरल हो जाता है तब कहा नहीं जाता कि सोशल मीडिया युवा पीढ़ी की पाठशाला है; अपने युवाओं को सोशल मीडिया के भटकाव में कैद पाता हूँ तब कहा नहीं जाता कि सोशल मीडिया युवा पीढ़ी की पाठशाला है।

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