प्रश्नोत्तर : तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

Questions answers Teesaree Kasam Ke Shilpkar Shailendra 

प्रश्न-1:- ‘तीसरी कसम’ फि़ल्म नहींसैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी। - आशय स्पष्ट करें
उत्तर-1:- सैल्यूलाइड एक पारदर्शी ज्वलनशील प्लास्टिक  है जो कि कपूर और नाइट्रोसेलुलास से एक शीट के रूप में बनता है। सिनेमा की रील इसी से बना करती थी। उस ज़माने में बननेवाली अन्य फिल्मों की तरह ‘तीसरी कसम’ का निर्माण भी इसी रील पर हुआ था।  यहाँ लेखक का आशय है कि जिस प्रकार कविता उसे सुनने वाले की भावनाओं को प्रभावित करती है उसी प्रकार से ‘तीसरी कसम’ देखने वाले की भावनाओं को प्रभावित करती है। इस फि़ल्म में मनुष्य के जीवन में विद्यमान दयाप्रेमसहयोगअपनापन आदि भावनाओं को उसी के अनुपात में प्रस्तुत किया गया था जैसा कोई भी मनुष्य अपने सांसारिक जीवन में उसे पाता है। इसी वजह से वह प्रत्येक देखने वाले के मन को कविता की तरह प्रभावित कर जाती है इसीलिए ‘तीसरी कसम’ को सैल्यूलाइड पर लिखी कविता कहा गया है।

प्रश्न-2:- फिल्म में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफ़ाई क्यों कर दिया जाता है ?
उत्तर-2:- फिल्म में दुःखद स्थितियों का चित्रांकन बहुत बढ़ाचढ़ा या उभारकर किया जाना दर्शकों की भावनाओं को उसके उच्च स्तर पर ले जाना है जहाँ वह बहुत व्याकुल हो जाए। यह दर्शकों का  भावनात्मक शोषण है जिसे व्यावसायिक लाभ कमाने के लिए किया जाता है। फि़ल्म निर्माता अपनी फि़ल्म के प्रचार एवं उसके माध्यम से अधिक से अधिक धन कमाने के लिए ऐसा किया करते हैं।


प्रश्न-3 :- व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती , उसे आगे बढ़ने का सन्देश देती है।’- आशय स्पष्ट करें।
उत्तर-2:- तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेन्द्र नामक पाठ में से ली गई इन पंक्तियों में लेखक बताना चाहता है कि जीवन में दुःख या पीड़ा आने का अर्थ यह नहीं होता है कि आगे बढ़ने के सारे रास्ते ही बन्द हो गए इसलिए जीवन से हार मान लेनी चाहिए। आदर्शपूर्ण जीवन बिताने वाला व्यक्ति कभी दुःखों या जीवन की पीड़ाओं से घबराता नहीं हैउनका सामना करता है और आगे बढ़ता है। शैलेन्द्र जीवन की पीड़ाओं से हार मानने वाले व्यक्ति नहीं थे और यही बात उनके गीतों में भी पाई जाती है।  जब राजकपूर ने फिल्म निर्माण के ख़तरों के बारे में बताया तब भी उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला और फि़ल्म बनाई।

प्रश्न -4:- लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि तीसरी कसम ने साहित्य रचना के साथ शत-प्रति शत न्याय किया है ?
उत्तर-4:- फणीश्वर नाथ 'रेणु' द्वारा लिखा गया उपन्यास तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम एक मन को छूनेवाले साहित्यिक रचना है। जब फि़ल्म निर्माता किसी कहानी का फिल्मांकन करते हैं तो धन और यश कमाने के उद्देश्य से उसमें कुछ अंश जोड़ देते हैं या घटा देते हैं परन्तु शैलेन्द्र ने तीसरी कसम में ऐसा कुछ नहीं किया। कलाकारों द्वारा सामाजिक वर्ग के अनुसार जीवन के सापेक्ष परिस्थितियों, सम्वेदनाओं (करुणा) का सजीव और सहज भावपूर्ण चित्रण इसे मसाला फिल्म की श्रेणी में नहीं अपितु एक सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक रचना पर आधारित सर्वोत्कृष्ट फिल्म की श्रेणी में रखता है।

प्रश्न -5:- उनका यह दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए।आशय स्पष्ट करें

उत्तर-5:- शलैन्द्र वे फिल्मों के माध्यम से वह ही  दिखाने के पक्षपाती  नहीं थे जो कि दर्शकों को पसन्द हो या उन्हें जिसकी जानकारी हो। शैलेन्द्र का मानना था कि फिल्में स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों की अभिरुचियों को बेहतर बनाने का माध्यम है। इसी कारण शलैन्द्र अपने एक गीत के बोल रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियों में जयकि शन द्वारा की गई आपत्ति पर कि लोग चार दिशाएँ तो समझ सकते हैं पर दस दिशाएँ नहीं समझेंगे, उसे बदलने के लिए तैयार नहीं हुए थे।


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