निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छबाय - पक्ष

NINDAK NIYARE RAKHIYE AANGAN KUTI CHHABAY FOR & AGAINST

आदरणीय अध्यक्ष महोदय, आज की वाद-विवाद प्रतियोगिता का विषय है - निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छबाय । मैं सदन की राय से सहमत हूँ ।

मान्यवर, मान्यवर, कबीर एक क्रांतिकारी कवि के रूप में जाने जाते हैं । ईश्वर ने उन्हें ऐसी परिस्थितियाँ दी कि जीवन और संसार के संबंध को समझ उन्होंने लोगो को अच्छा मार्ग दिखाने का कार्य किया। कबीरदासजी की इन पंक्तियों में भी जीवन और संसार के आनंद का सार छुपा हुआ है। इस संसार में जो भी व्यक्ति जन्म लेता है वह ज्ञान की दृष्टि से अपूर्ण ही होता है । अपनी इन्द्रियों के माध्यम से धीरे-धीरे उसके ज्ञान का विकास होता है। फिर भी हम उसे सम्पूर्ण नहीं कह सकते । जीवन में कोई संपूर्ण नहीं होता इस बात को कबीरदासजी ने समझ लिया था । कोई तो जीवन में ऐसा चाहिए जो हमें हमारी बुराइयों का आइना दिखा सके । ताकि हम और अच्छे बने। समाज में जो देखने में आता है कि बुराई करने वाले को कोई भी पसन्द नहीं करता है और सब उन से दूरी रखना चाहते हैं। यह कबीर ही थे जिन्होंने लोगो के द्वारा किए जा रहे इस व्यवहार को पहचाना और संदेश दिया कि बुराई करनेवाले के प्रति नम्रता की भावना रखो क्योंकि हमारे जीवन में हमें ऐसे बहुत कम लोग मिलेंगे जो बिना किसी स्वार्थ के हमारी निंदा करेंगे।  अपनी बुराइयों को सहज स्वीकार करना और फिर उन्हें अपने व्यक्तित्व में से निकालना कहने में भले ही आसान-सा कार्य लगे पर वास्तव में आसान-कार्य है नहीें । किसी की निंदा करना भी आसान कार्य नहीं है ।

मान्यवर, कबीरदास जी की यह पंक्तियाँ आज भी महत्व रखती हैं । यदि सभी व्यक्ति अपने आचरण के बुरे पक्ष को जानकर उसे सुधारेंगे तो दुनिया कितनी सुन्दर बन जाएगी इस बात की कल्पना की जा सकती है। आँगन में कुटी छबाय का मतलब ये नहीं है कि निंदा करने वाले के लिए घर भी अपने आँगन में ही बना दो । कबीर जी का ऐसा कहे जाने से मतलब है कि अपने दिल के आँगन में उसे जगह दो, उसके प्रति शत्रुता की भावना न रखो, उससे प्रेम करो  क्योंकि वह तुम्हारा भला कर रहा है। बुराई को एक दिन समाप्त होना ही होता है और अच्छाई अमरता की  तरफ लेकर जाती है -- इसमें कोई संशय नहीं है । कबीर हमें अच्छाई के रास्ते पर ही चलने के लिए प्रेरित करते हैं।

मान्यवर, मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी है और समाज का अस्तित्व उसके द्वारा किए गए कार्याें और व्यवहार पर ही निर्भर करता है। यदि उस पर अंकुश नहीं होगा तो वह मनमाने तरीके से व्यवहार करेगा जिसकी वजह से समाज का वातावरण बिगड़ जाएगा। निदंक को आदर देने उससे स्वयं में मौजूद बुराइयों के बारे में जानकर उन्हें दूर करने पर स्वयं को ही नहीं अपितु समाज को भी पतन की ओर जाने से रोकने में सहायता मिलती है।

मान्यवर, अंत में मैं इतना ही कहूँगा कि अपनी निंदा को सुनें और उस व्यक्ति  के प्रति आभारी रहें उससे प्रेम करें जो आपकी बुराइयों को बता रहा है। कबीर दास जी के शब्दों में निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छबाय, बिन पानी बिन साबुन निर्मल करे सुभाय।। (समाप्त)


निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छबाय - विपक्ष  

आदरणीय अध्यक्ष महोदय, आज की वाद-विवाद प्रतियोगिता का विषय है - निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छबाय । मैं सदन की राय से सहमत नहीं हूँ ।

मान्यवर, श्रीमान् कबीरदासजी ने जब यह दोहा लिखा उस समय समाज और परिवार की स्थिति ऐसी थी कि उनकी इस बात को लागू किया जा सकता था पर आज बहुत कठिन -कार्य है। उन्होंने तो लिख दिया कि अपनी बुराई करनेवाले को अपने पास में रखो और उसके लिए अपने आँगन में एक कुटिया भी बनवा दो । मान्यवर, समय बदल गया है यदि हास्य की बात करूँ तो पहले आँगन चाहिए फिर निंदक के लिए कुटिया बनवाई जाए और फिर इस बात का कोई प्रमाण नहीं हो सकता कि आपको सच्चा निंदक मिल ही जाए। जब से होश सम्भाला है तब से आज तक मुझे सच्चाई के रास्ते पर चलने वाला एक भी आदमी नहीं मिला है फिर कैसे मानलूँ कि निदंक भी सच्चा मिल ही जाएगा। दोष किसे दूँ ? हमारी भावनाएँ और हमारी व्यवस्थाएँ ऐसी हो गई हैं कि सच्चा नेता, सच्चा समाज-सेवक, सच्चा डाॅक्टर, सच्चा प्यार कहीं देखने में ही नहीं आता है फिर सच्चा निंदक मिल ही जाए ऐसी व्यवस्था भी नहीं है। मान्यवर, मुझे ही देख लें मैं प्रतियोगियों के द्वारा कही जा रही बात को गलत ही तो ठहराने के लिए खड़ा हूँ। और मैं यह मानता हूँ कि यह कार्य मुझ से अच्छा कोई कर ही नहीं सकता। फिर पूरे देश, आदमी के पूरे समाज में यही तो बात है कि हर आदमी अपने को दूसरे से बड़ा साबित करने में लगा हुआ है कि उससे तो बड़ा कोई है ही नहीं। फिर इतना महँगा सौदा क्यों किया जाए। जब घर से बाहर कदम रखते ही हजारों आदमी प्रतिदिन आपकी निंदा करने के लिए हरसमय तैयार हो तो फिर कुटिया बनवाने का खर्चा ही क्यों किया जाए।

मान्यवर, आज का समय ही बदल गया है कबीरदासजी के समय में निंदा करनेवाले बहुत मुश्किल से मिला करते होंगे पर आज स्थिति विपरीत है। आजकल प्रशंसा करने वाले नहीं मिलते हैं। सुबह की शुरुआत चाहे टी वी से करे या समाचार-पत्र से निंदा ही सुनने को मिलती है। दफतर में काम करने जाओ तो वहाँ सहकर्मी निंदा करने में कोई कमी छोड़ते दिखाई नहीं देते और यदि गलती से अपने बाॅस के सामने पड़ जाए तो फिर अपना जीवन ही निस्सार-सा लगने लगता है कि इस बाॅस नाम के आदमी को संसार में क्या भगवान ने निंदा करने के लिए ही पैदा किया है या फिर मुझे संसार में इन्हें सुनने के लिए पैदा किया है। मान्यवर, आजकल तो भगवान की कृपा इतनी बरस रही है कि निंदा करने वाले के लिए कुटी बनाने की आवश्यकता ही नहीं है संसार के बहुत से विवाहितों को देखकर लगता है कि उन्होंने तो निंदा करनेवाले को अपने घर में ही नहीं अपने दिल में भी जगह दे दी है। जब सारा का सारा संसार निंदा करने वालों से भरा हुआ है फिर निंदक को अपने पास रखने और उसके लिए घर बनाने की आवश्यकता ही कहाँ है ? लगता हैं कबीरदासजी के इस कथन ही प्रासंगिकता ही नहीं रही है।

 मान्यवर, मेरे विपक्षी वक्ता मेरे कथन की बेजा निंदा करने में कोई कसर नहीं रखेंगे। हाथ कंगन को आरसी क्या, आपको जल्दी ही पता भी लग जाएगा। अंत में यही कहूँगा कि प्रशंसक नियरे राखिए आँगन कुटी छबाय,आत्मविश्वास टूटे नहीं,आनंद रहे अघाय। (समाप्त)


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