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कारतूस पाठ के पात्रों से सम्बन्धित अन्य जानकारियाँ

सआदत अली:- नवाब शुजाउद्दौला के दूसरा बेटा और आसिफउद्दौला का सौतेला भाई है। पूरा नाम है - यामीन उद्दौला नवाब सआदत अली। सआदत अली अपने सौतेले भाई, आसिफुद्दौला के बाद अवध के तख्त पर 1798 में बैठा। सआदत ने 1801 में अंग्रेजों को आधा अवध दे दिया। इन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था।

आसिफउद्दौला (शासन काल 1775 ई.-1797 ई.):-  सआदत अली का सौतेला भाई था। अवध के नवाब शुजाउद्दौला का बेटा और उत्तराधिकारी था। इनके उत्तराधिकारी वजीर अली खान हुए।

वजीर अली:- आसिफउद्दौला के दत्तक (Adopted) पुत्र। नवाब वजीर अली खान ने अंग्रेजों के खिलाफ बनारस से ही बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था। अंग्रेजों ने नवाब वजीर अली खान पर धोखे का आरोप लगाया और सिंहासन से हटाकर बनारस भेज दिया और इनके चाचा सआदत अली खान को अवध का अगला नवाब बनाया गया। वजीर अली को रामनगर में नजरबंद कर दिया गया। उन्हें पेंशन रूप में डेढ़ लाख रुपये सालाना दिया जाता रहा। 18 साल की उम्र में ही झूटे आरोप लगाकर सिंहासन छीने जाने के कारण वजीर अली को अंग्रेजों के प्रति घृणा करता था। इसी दौरान अंग्रेजों का अगला हुक्म आया जिसमें वजीर अली को बनारस से ब्रिटिश मुख्यालय कोलकाता भेजने को कहा गया। इस बात से वजीर अली की अंगेजों के प्रति घृणा की आग और भड़क गई। वजीर अली ने अपने वफादार इज्जत अली और वारिस अली को बुलावा भेजा और गुपचुप तरीके से 200 सिपाहियों का सेना-समूह भी तैयार कर लिया। 14 जनवरी 1799 को वजीर अली ने स्वयं को बनारस से हटाने के फैसले के विरोध में तत्कालीन कमांडर जार्ज फ्रेडरिक चेरी से मिलने की इच्छा प्रकट की। वह अपने सिपहसालार इज्जत अली और वारिस अली के साथ चेरी के मिंट हाउस स्थित घर पर अपने सेना समूह के साथ पहुँचा और आपसी बातचीत के दौरान ही कमांडर जार्ज फ्रेडरिक चेरी पर हमला बोल दिया। कहते हैं कि बागियों ने कमांडर चेरी, कैप्टन कानवे, रोबर्ट ग्राहम, कैप्टन ग्रेग इवांस सहित सात अंग्रेज सिपाहियों मार दिया। कमांडर के घर से कुछ दूर तत्कालीन मजिस्ट्रेट एम. डेविस का घर था। इन बागियों ने यहाँ भी हमला कर दिया और कई संतरियों को मार डाला। पत्नी, बच्चों और दो नौकरों को डेविस ने छत पर छिपाया और स्वयं बागियों से लड़ने लगा।  मजिस्ट्रेट ने बागियों को काफी देर तक रोके रखा। ब्रिटिशों पर हुए इस आक्रमण के समाचार आग की तरह फैल गए और मजिस्ट्रेट की रक्षा के लिए ब्रिटिश फौज आ गयी। बागी पीछे हटे पर इस आक्रमण के समय में नवाब के साथ और भी हजारों बागी जुड़ गए। नवाब की बगावत को कुचलने के लिए कोलकाता से जनरल अर्सकिन को फौज लेकर बनारस आना पड़ा। अर्सकिन के भारी फौज के आगे बागी टिक नहीं सके। सैकड़ो लोग मारे गये बचने का कोई रास्ता ना देख सबने आपसी सहमति से वहाँ से निकल जाने की योजना बनाई वजीर अली भी जान बचाते-बचाते राजस्थान के बुटवल पहुँचा। तब जयपुर के तात्कालीन अंग्रेज से मित्रता निबाहनेवाले राजा ने उन्हें अपने यहाँ ठहरने का आमंत्रण दिया। नवाब के साथ धोखा करके उसने 1799 में वजीर अली को अंग्रेजों के हवाले कर दिया। अंग्रेजों ने वजीर अली को कोलकाता के फोर्ट विलियम जेल भेज दिया। 17 साल जेल में गुजारने के बाद 1817 में नवाब की जेल में ही मौत हो गयी। 

शमसुद्दौलाः- बंगाल के नवाब का रिश्ते में भाई।

लाॅर्ड क्लाइव:- ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा ब्रिटिश शासन को मजबूती प्रदान करने के लिए भारत में नियुक्त किया गया। यह बक्सर के युद्ध का सेनानायक था। यह बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला, अवध के नवाब शुजाउद्दौला, और मुगल नवाब शाहआलम द्वितीय की सेना को अपनी चालाकी, कूटनीति और सूझबूझ से हराकर बंगाल प्रदेश में ब्रितानी शासन के विरोध को पूरी तरह समाप्त कर दिया।

बक्सर का युद्धः- बक्सर का युद्ध अक्टूबर 1764 में बक्सर नगर के आसपास ईस्ट इंडिया कंपनी और मुगल नबाबों के बीच लड़ा गया था।
बंगाल के नबाब मीर कासिम, अवध के नबाब शुजाउद्दौला, तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना अंग्रेज कंपनी से लड़ रही थी। लड़ाई में अंग्रेजों की जीत हुई और इसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उड़ीसा और बांग्लादेश का दीवानी और राजस्व का अधिकार अंग्रेज कंपनी के हाथ चला गया।

प्लासी का युद्धः- 23 जून 1757 को ईस्ट इंडिया कम्पनी और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की सेना के बीच यह युद्ध हुआ था। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला का सेनापति मीर जाफर था जोकि युद्ध से पहले ही अंग्रेजों से मिल चुका था क्योंकि वह स्वयं नवाब सिराजुद्दौला को हटाकर शासक बनना चाहता था। अंग्रेजी सेना की कमान कर्नल लार्ड क्लाइव के पास थी। मीर जाफर के अलावा लार्ड क्लाइव नवाब के दो अन्य सेनापतियों, उसके दरबारियों और सेठ अमीचंद को भी कूटनीति से अपनी तरफ मिला लिया था। कहते हैं, जाफर की गद्दारी के कारण 40 मिनट में ही नवाब की सेना ने समर्पण कर दिया और इस प्रकार नवाब सिराजुद्दौला के शासन का अंत हुआ और भारत में अंग्रेजी शासन की नींव रखी गई।

सिराजुद्दौलाः- बंगाल मुगल साम्राज्य का एक अभिन्न अंग था परन्तु औरंगजेब की मृत्यु के बाद इसके विभिन्न प्रांतों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। जिसमें से अलावर्दी खाँ ने बंगाल पर अपना अधिकार कर लिया। उनके  सिर्फ तीन पुत्रियाँ थी। बड़ी लड़की निःसन्तान थी। दूसरी और तीसरी से एक-एक पुत्र थे। जिसका नाम शौकतगंज और सिराजुद्दौला था। वे सिराजुद्दौला को अधिक प्यार करते थे। इसलिए अपने जीवन काल में ही उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। 10 अप्रैल 1756 को अलावर्दी की मृत्यु हुई। और सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना परन्तु शुरु से ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ उसका संघर्ष अवश्यम्भावी हो गया। अंत में 23 जून 1757 को दोनों के बीच युद्ध छिड़ा जिसे प्लासी युद्ध के नाम से जाना जाता है। मीर जाफर व अन्य लोगों की गद्दारी के कारण सिराजुद्दौला यह युद्ध हार गया। युद्ध के बाद मीर जाफर के पुत्र ने सिराजुद्दौला का कत्ल कर दिया।

1 टिप्पणी:

हरीश रावत ने कहा…

बहुत बढ़िया सर जी ! ये बहुत ही उपयोगी सामग्री है|

धन्यवाद !