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Diwano ki hasti

सरलार्थ
Diwano ki hasti

दीवानों की हस्ती
दीवाना उसे कहते हैं जो किसी भी अच्छे-बुरे समय और परिणाम, सुख-दुख की परवाह किए बिना अपने कार्य को करने में दिन-रात उत्साह के साथ लगा होता है यानी अपने कार्य के पीछे पागल।  हस्ती का अर्थ होता है-महत्व। इस प्रकार दीवानों की हस्तीका अर्थ हुआ -दीवानों का महत्व।

कविता के बारे में
भारतीय इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण समय भारत पर अंग्रेजों के शासन का काल था जिसे उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय लोग अपनी जान की परवाह किए बिना संघर्ष कर रहे थे। इस संघर्ष में लगे लोग आजादी के दीवाने थे। श्री भगवती चरण वर्मा ने इन्हीं दीवानों के बारे में अपनी इस कविता में बताया है।

हम दीवानों की क्या हस्ती,
आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले।।
सरलार्थ : ये लोग आजादी के काम में लगे हुए दीवानें हैं । ऐसे दीवानों का किसी को भी कुछ पता नहीं होता है। ये मनमौजी होते हैं। जहाँ इन्हें अपनी आवश्यकता का अहसास होता है वहीं शीघ्र पहुँच जाते हैं और लोगों के जीवन से निराशा और दुःख को दूर कर उनका जीवन खुशियों से भर देते हैं।
    
आए बनकर उल्लास कभी,
आँसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए,
अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले।।
सरलार्थ : ये आजादी के दीवानें अपने साथ जीवन के प्रति उमंग और उल्लास का संदेश ले कर आते हैं इसलिए जहाँ भी जाते हैं उन लोगों में उमंग और उल्लास का संचार कर देते हैं। ये उन लोगों के दुःखों को दूर कर उनके अपने जैसे हो जाते हैं इसलिए जब उस स्थान से जाते हैं तो इनका जाना लोगों को दुःखी कर देता है। इनके आने पर भी लोगों को आश्चर्य होता है और इनके जाने पर भी।

किस ओर चले? मत ये पूछो,
बस चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले।।
सरलार्थ : इन दीवानों का कुछ पता नहीं होता है। इन्होंने कर्म करना और मानव जीवन को दुःख, निराशा और पीड़ा से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया होता है इसलिए जिधर आवश्यकता का अनुभव करते हैं, वहीं पहुँच जाते हैं। ये इस संसार से अनुभव ग्रहण करते हैं और जो कुछ इन्होंने संसार से सीखा है उसे लोगों के बीच में बाँटते चलते हैं।

दो बात कहीं, दो बात सुनी,
कुछ हँसे और फिर कुछ रोए
छक कर सुख-दुःख के घूँटों को,
हम एक भाव से पिए चले।।
सरलार्थ : दीवानें लोगों के सुख-दुःख की बातें सुनते हैं और अपने मन की बातें लोगों से करते हैं। सुख की बातें प्रसन्नता देती हैं तो दुःख की बातें आँखों में आँसू भर देती है। दीवानों की एक विशेषता यह भी है कि वे जीवन के सुख और दुःख को समान भाव से ग्रहण करते हैं। न तो दुःख से दुःखी होते हैं और न सुख से सुखी।

हम भिखमंगों की दुनिया में,
स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर,
ले असफलता का भार चले।।
सरलार्थ : कविवर इस संसार को भिखमंगो का संसार कहते हैं क्योंकि इस संसार में आए व्यक्ति दूसरों से सदा कुछ पाने की चाह रखते है। विशेषकर इस संसार में हर प्राणी दूसरे से प्रेम चाहता है। दीवाने लोगों में मुक्तहस्त (खुले हाथों) प्यार बाँटते हैं। जब वे किसी कार्य को हाथ में लेते हैं और किसी कारणवश उस कार्य को करने में असफल होते हैं तब उस कार्य की असफलता का भार उनके दिल पर सदा के लिए रहता है।

अब अपना और पराया क्या,
आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बंधे थे और स्वयं,
हम अपने बन्धन तोड़ चले।।
सरलार्थ : कवि कहते हैं अब हमने हमारी जिम्मेदारी को पूरा कर लिया है। इस जीवन में रहते हुए जो कार्य हमें करने थे वे सभी कार्य हमने किए हैं। हमारे लिए कोई अपने-पराए के भेद का महत्व नहीं है और अब यह इच्छा करते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी सुखपूर्वक अपने जीवन को बिताए। हम ने स्वयं ही संसार  के बंधनों को स्वीकार किया था और अब हम स्वयं ही इन बंधनों से मुक्त हो रहे हैं।
यह कविता जीवन-दर्शन के बारे में भी बताती है।
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