बिहारी दोहे : सरलार्थ

BIHARI DOHE 
1.
सोहत  ओढ़ैं पीतु  पटु  स्याम,  सलौनैं  गात।
मनौ  नीलमनि-सैल  पर  आतपु  परयो प्रभात।।

सरलार्थ:-
इस दोहे में कवि बिहारी श्री कृष्ण की वेशभूषा व सुन्दरता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उनके साँवले शरीर पर पीले वस्त्र ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे किसी नीलम के पर्वत पर उगते सूरज की किरणें पड़ रही हों। 

2.
कहलाने  एकत  बसत  अहि  मयूर,  मृग  बाघ।
जगतु  तपोबन  सौ  कियौ  दीरघ-दाघ  निदाघ।।

सरलार्थ:-
इस दोहे में कवि बिहारी भयंकर गर्मी के प्रभाव के बारे में बता रहे हैं कि गर्मी की भीषणता में विपरीत स्वभाववालेएक-दूसरे के प्रति शत्रुता रखनेवाले जीव भी अपनी शत्रुता को भूलकर एकसाथ देखे जाते हैं। साँप और मोर एवं हिरन और बाघ एक दूसरे के शत्रु हैं फिर भी गर्मी में अपनी शत्रुता को भूल साथ-साथ दिखाई देते हैं। इन्हें ऐसे देखकर लगता है जैसे संसार एक तपोवन की भाँति हो गया है जिसमें सब आपसी शत्रुता को भूलकर प्रेमभाव से रह रहे हैं। ( संकट के समय में आपसी भेद रखनेवाले भी एकसाथ हो जाते हैं। )
(तपोवन यानी वह वन जहाँ ऋषि&मुनिजन तपस्या करते हैं और उनके तप के प्रभाव से चारों ओर प्रेम का वातावरण बन जाता है।)

3.
बतरस-लालच  लाल  की  मुरली  धरी  लुकाइ।
सौंह  करैं  भौंहनु  हँसै,  दैन  कहैं  नटि  जाइ।।

सरलार्थ:-
गोपियाँ बालकृष्ण की मुरली(बांसुरी) के प्रति ईर्ष्या की भावना रखती हैं कि मुरली सदा कृष्ण के साथ रहती है और उनके होंठों  पर विराजती है। वे बालकृष्ण से बातचीत भी करना चाहती हैं। इसलिए उनकी बांसुरी को छुपा देती हैं। बालकृष्ण जब उनसे बांसुरी के बारे में पूछते हैं तो वे मना कर देती हैं। उनकी आँखों और भौंहों के संकेतो से कृष्ण समझ जाते हैं कि बांसुरी उनके पास ही है। जब वे उसे देने के लिए कहते हैं तो वे उसका अपने पास होने से इंकार कर देती हैं।

4.
कहतनटतरीझतखिझतमिलतखिलतलजियात।
भरे  भौन  मैं  करत  हैं  नैननु  हीं  सब  बात।।

सरलार्थ:-
जब हम दूसरों की भावनाओं को समझते हैं तो वहाँ किसी भाषा की आवश्यकता नहीं रहती अपितु संकेतों के माध्यम से ही एक-दूसरे की बात को समझा जा सकता है। एक भवन में जब प्रेयसी अपने परिजनों से घिरी हुई है तो प्रेमी आँख के संकेतों से अपने हृदय के भाव व्यक्त करता है जिसे समझ प्रेयसी वैसा करने के लिए इंकार कर देती है। उसकी इस इंकार करने की मुद्रापर प्रेमी फ़िदा हो जाता है। उसे इस प्रकार से रीझता जानकर प्रेयसी झुंझला जाती है। फिरदोनों की आँखें मिलती हैं तो दोनों प्रसन्न हो जाते हैं और प्रेयसी लजा जाती है। इस प्रकार प्रेमी-प्रेमिका भरेपूरे घर में ही आँखों के संकेतों से अपनी भावनाओं और विचारों का आदान-प्रदान कर लेते हैं।

5.
बैठि रही अति सघन बनपैठि सदन-तन माँह।
देखि  दुपहरी  जेठ  की  छाँहौं  चाहति  छाँह।।

सरलार्थ:-  
इस दोहे में गर्मी की ऋतु के सय जेठ मास में पड़नेवाली गर्मी की भयंकरता के बारे में बताते हुए कहते हैं कि गर्मी का प्रभाव इतना भीषण होता है कि कहीं भी आराम नहीं मिलता है। यहाँ तक कि छाँव में भी शीतलता का अहसास नहीं होता। ऐसा लगता है जैसे गर्मी की ऋतु में दोपहर के समय छाँह भी गर्मी की भीषणता से बचने के लिए किसी घने जंगल में चली गई हो या स्वयं को किसी इमारत में छुपा लिया हो।  गर्मी की ऋतु में दोपहरी में गर्मी की तपन का प्रभाव ऐसा है कि छाँव भी उससे बचने के लिए छायाँ की कामना करती है।

6.
कागद पर लिखत न बनतकहत सँदेसु लजात।
कहिहै सबु तेरौ हियौमेरे हिय की बात।।

सरलार्थ:-  
प्रेम में हृदय की कैसी स्थिति हो जाती है इसे बताते हुए बिहारी कहते हैं कि प्रेयसी अपने प्रियतम को सन्देशा भेजना चाहती है पर न तो उससे लिखते ही बनता है और न ही कहते। मन की भावनाओं को लिखकर व्यक्त नहीं किया जा सकता इसलिए वह लिखकर बताने में स्वयं को असमर्थ पाती है। सेविका से अपने दिल की बात कहने में शर्म का अनुभव होता है इसलिए वह कहकर भी सन्देशा नहीं भेज पाती है। प्रेयसी कहती है कि जिस प्रकार मेरा हृदय तुम्हारे वियोग में व्याकुल है उसी प्रकार की अवस्था तुम्हारे(प्रेमी के) दिल की भी होगी अतः स्वयं के हृदय से पूछोगे तो मेरी अवस्था का भी पता चल जाएगा।

7.
प्रगट भए द्विजराज-कुलसुबस बसे ब्रज आइ।
मेरे  हरौ   कलेस  सब,  केसव केसवराइ।।

सरलार्थ:-  
इस दोहे में बिहारी के जीवन के बारे में जानकारी मिलती है। वे भगवान कृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि मैं ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ और जीवनयापन के लिए तुम्हारे ब्रज-प्रदे में आ गया। इस प्रकार तुम्हारी शरण में ही आ गया। मेरे पिता का नाम केव है और तुम भी केव हो इसलिए तुम मेरे समस्त कष्टों को दूर करो। ( तुम केव हो मेरे पिता भी केव है इसलिए तुम मेरे समस्त कष्टों को दूर करो)

8.
जपमाला,  छापैं,  तिलक  सरै  न  एकौ  कामु।
मन-काँचै  नाचै  बृथा,  साँचै  राँचै  रामु।।

सरलार्थ:-  
हिन्दू धर्म में माला लेकर भगवान के नाम के जप करनामाथे पर विभिन्न प्रकार के तिलक लगाना या ऊँ आदि के छापे लगा लेने का प्रचलन देखने को मिलता है। बिहारी जी इन सभी को आडम्बर(बाहरी दिखावा) कहते हैं। वे कहते हैं कि इन सब को करने में न तो भगवान की भक्ति ही होती है और न ही उनकी प्राप्ति। संसार के दिखावों और सुख-सुविधाओं में डूबा मन कच्चा होता है उसे भगवान की प्राप्ति नहीं होती है। इस प्रकार की भक्ति भावना व्यर्थ है। संसार के आडम्बरों व दिखावों से परे (दूर) सच्चा मन ही भगवान की ओर लगा रहता है और उन्हें प्राप्त कर पाता है।

1 टिप्पणी:

कवि बैजनाथ शर्मा 'मिंटू' ने कहा…

आदरणीय, बहुत-बहुत शुक्रिया आपका