अंक आधारित परीक्षा प्रणाली ही सर्वोत्तम विकल्प

ank aadharit shiksha pranali
भारतीय सन्दर्भ में वर्तमान अंक आधारित परीक्षा प्रणाली ही सर्वोत्तम विकल्प है।- पक्ष
  आदरणीय अध्यक्ष महोदय, मैं सदन की राय से सहमत हूँ कि भारतीय सन्दर्भ में वर्तमान अंक आधारित परीक्षा प्रणाली ही सर्वोत्तम विकल्प है।
  मान्यवर, जीवन में मूल्यांकन का सर्वाधिक महत्व होता है। इसी के द्वारा जीवन में सफलता  और प्रगति का निश्चय किया जा सकता है।  इसी प्रकार शिक्षा क्षेत्र में मूल्यांकन को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है क्यों कि यही वह मानदण्ड है जिसकी सहायता से किसी छात्र के शिक्षार्जन, ज्ञानार्जन और मानसिक व व्यावहारिक विकास से सम्बन्धित विभिन्न उपलब्धियों का पता लगाया जा सकता है।
 
मान्यवर, कपड़े को नापना है तो मीटर एक साधन बन जाता है, दूरी नापनी है तो किलोमीटर में नाप साधन बन जाती है और  जब बात आती है भारतीय सन्दर्भ में परीक्षा प्रणाली की तो वहाँ इस नाप या पैमाने का कार्य करती है उसकी अंक व्यवस्था। क्योंकि छात्रों की प्रगति के मूल्यांकन के लिए कोई न कोई तो  साधन तो होना ही चाहिए और इस अंक व्यवस्था से बेहतर साधन हमारे पास नहीं है।

मान्यवर, परीक्षा इस तथ्य की सही तस्वीर प्रस्तुत करती हैं कि छात्र ने विषय को किस स्तर तक समझा है? उसका लेखन व मौखिक अभिव्यक्ति कौशल का स्तर कैसा है? छात्र के समक्ष भी एक चुनौति रहती है कि उसे श्रेष्ठ से श्रेष्ठ अंक प्राप्त करने हैं। छात्र स्वयं अपने द्वारा किए गए परिश्रम का आकलन कर सकता है और यह निश्चय कर सकता है कि अपने स्तर में सुधार लाने के लिए उसे और  कितना प्रयत्न करना पड़ेगा जो कि किसी अन्य प्रकार से इतने स्पष्ट रूप में नहीं पाया जा सकता।
  मान्यवर, अंक आधारित परीक्षा प्रणाली के द्वारा छात्रों के बौद्धिक स्तर का औसत तो निकाला ही जा सकता है साथ ही यह वर्गीकरण भी किया जा सकता है कि कौन बालक तीव्र बुद्धि है और कौन बालक मन्द बुद्धि है। इससे बालक की विषयानुसार रूचि भी पता लग जाती है कि उसकी विशेष योग्यता व दक्षता किस विषय में है। इसमें कोई संशय नहीं है कि विभिन्न अवसरोें पर ली जाने वाली परीक्षाएँ उसका मूल्यांकन तो करती ही हैं साथ ही उसे विषय को दोहराने का अभ्यास भी कराती हैं और सर्वविदित है कि दोहराने से विषय अच्छी तरह याद हो जाता है।
मान्यवर, यह सर्व-विदित तथ्य है कि लक्ष्य सामने हो, चुनौती सामने हो तो ही व्यक्ति उसे प्राप्त करने या पार पाने का प्रयत्न करता है। अंक आधारित परीक्षा प्रणाली के माध्यम से व्यक्ति को अपनी वास्तविकता का ज्ञान तो रहता ही है साथ ही उसे यह भी अनुमान हो जाता है कि उसे अभी किस अनुपात में परिश्रम करना है।
मान्यवर , यदि मेरे विपक्षी वक्ता छात्रों में बढ़ते अवसाद और आत्महत्या जैसी घटनाओं के लिए अंक आधारित परीक्षा प्रणाली को दोष देते हैं तो यह उनकी समझ का दोष है क्योंकि इस तरह की घटनाओं के जिम्मेदार अंक आधारित परीक्षा प्रणाली नहीं है। इस तरह की घटनाओं  के लिए जिम्मेदार है हमारी व्यवस्था, बालक द्वारा पूरे साल न पढ़ा जाना और परीक्षा नजदीक आने पर मानसिक संतुलन खो देना है और ऐसे समय में उसके अभिभावकों द्वारा ध्यान न दिया जाना है।
मान्यवर अतएव मैं यहीं कहूँगा कि भारतीय सन्दर्भ में वर्तमान अंक आधारित परीक्षा प्रणाली ही सर्वोत्तम विकल्प है। क्यों कि इससे स्वयं बालक, अभिभावक और अध्यापक को छात्र की बौद्धिक क्षमता, उसकी योग्यता की वास्तविक स्थिति पता रहती है। विद्यालय में पढ़ाई का स्तर और उसमें पढ़ने वाले समस्त छात्रों का शैक्षिक स्तर भी इस अंक आधारित परीक्षा प्रणाली के माध्यम  से सहज ही लगाया जा सकता है।
॥ धन्यवाद ॥
भारतीय सन्दर्भ में वर्तमान अंक आधारित परीक्षा प्रणाली ही सर्वोत्तम विकल्प है। - विपक्ष
  आदरणीय अध्यक्ष महोदय, मैं सदन की राय से सहमत नहीं हूँ कि भारतीय सन्दर्भ में वर्तमान अंक आधारित परीक्षा प्रणाली ही सर्वोत्तम विकल्प है।
  मान्यवर, प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशेषताएँ  होती हैं जो उसे अन्यों से अलग रूप में प्रस्तुत करती हैं। प्रत्येक छात्र में शारीरिक-विकास, बुद्धि, रूचि, समझ, प्रस्तुति, सम्वेग, स्वभाव आदि के स्तर अलग-अलग होते हैं। इस विभिन्नता में क्षेत्र और भाषा का भी पूर्ण योगदान होता है। शिक्षा की व्यावहारिकता के अनुसार शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति की योग्यता के अनुसार दी जानी चाहिए। परन्तु क्या हमारी  शिक्षा व्यवस्था शिक्षा की इस व्यावहारिकता को पूरा करती है? क्योंकि जिस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था होगी उसी प्रकार की उसकी परीक्षा-प्रणाली भी होगी। वर्तमान की भारतीय शिक्षा- प्रणाली को इस प्रकार ढाला जा रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार शिक्षा प्राप्त कर सके परन्तु अभी भी इस प्रणाली में अनगिनत विसंगतियाँ हैं जिन्हें दूर करना अत्यावश्यक है और जब हमारी  शिक्षा-प्रणाली में पूर्णता नहीं है तो उसकी अंक आधारित परीक्षा प्रणाली कैसे सम्पूर्ण कही जा सकती है?
  मान्यवर, गेहूँ की माप और किसी व्यक्ति की स्वभावगत विशेषताओं और ज्ञान के स्तरों की माप में बहुत अंतर है। इसीलिए एक छात्र के ज्ञान, बुद्धि, प्रवणता, रूचि, व्यक्तित्व आदि की जाँच करने के लिए विभिन्न प्रकार की परीक्षाएँ और उनमें दिए गए प्रश्नों में विभिन्न प्रकार के स्तर देखने को मिलते हैं परन्तु  इनका अंक विभाजन व्यक्ति की स्वभावगत  विशेषताओं का मापदण्ड नहीं बन सकता है और न ही अंक आने पर निश्चित तौर पर व्यक्ति की भावी संभावनाओं के बारे में बताया जा सकता है। यदि वर्तमान का शिक्षा-जगत ऐसा किए जाने की हामी भरता है तो वह छात्रों के भविष्य और जीवन से खिलवाड़ कर रहा है क्योंकि हमारी शिक्षा-व्यवस्था हमें निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति कराने में समर्थ नहीं है और परीक्षा छात्र की  प्रतिभा के विकास का साधन न रहकर साध्य बन अपनी उपयोगिता खोती जा रही है। विषय-विशेष में अच्छे अंक लाने के लिए पढ़ना और अंक प्राप्त कर लेना किस प्रकार छात्र के  सर्वांगीण विकास को प्रकट कर सकता है। बाजार में उपलब्ध सहायक पुस्तकों, कुंजियों व वन-वीक सारीजों ने विषय-विशेष में अंक प्राप्त करना और भी सरल कर दिया है, ऐसे में किसी छात्र का न तो सर्वांगीण विकास ही हो पाता है और न ही उसके द्वारा प्राप्त अंकों का कोई महत्व ही रह जाता है। क्या ऐसी अवस्था में अंक आधारित शिक्षा प्रणाली को सर्वोत्तम विकल्प कहा जा सकता है?
  मान्यवर, क्या हमें कक्षा 10 तक विभिन्न स्तरों पर अंक आधारित शिक्षा-प्रणाली का त्याग नहीं कर देना चाहिए? क्या यह अंक आधारित प्रणाली छात्रों के आत्मविश्वास में कमी नहीं लाती है? क्या यह  निराशा को जन्म नहीं देती हैै? क्या इस प्रणाली के द्वारा छात्र के मानसिक, बौद्धिक व शारीरिक वास्तविक स्तर का पता चलता है? क्या इस प्रणाली के तहत शिक्षा का उद्देश्य छात्र के सर्वांगीण  विकास का न रहकर मात्र परीक्षा में उत्तीर्ण होना नहीं रह जाता है? क्या छात्र द्वारा प्राप्त अंक उसके सर्वांगीण विकास को इंगित करते हैं? मान्यवर, मेरी राय में भारतीय सन्दर्भ में वर्तमान अंक आधारित परीक्षा प्रणाली अपने उद्देश्यों में सफल नहीं कही जा सकती।
  मान्यवर, जब हम अन्य विकल्पों की बात करते हैं तब हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सुधारों के द्वारा अंक आधारित परीक्षा-प्रणाली को बेहतर बनाया जा सकता है। छात्रों को अंक संख्या के रूप में न देकर उन्हें उनकी खामियों को उजागर कर सुधारात्मक उपायों के साथ श्रेणी-विभाजन के रूप में दिए जाएँ जिससे छात्र अपनी कमियों के प्रति सचेत हो, हीनता का शिकार न हो और अपने सर्वांगीण विकास के प्रति सजग बन, जीवन में निश्चित  उद्देश्यों को प्राप्त कर सकें।

॥ धन्यवाद ॥

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