आदर्श और नैतिकता के बिना जीवन कुछ भी नहीं है । - पक्ष

Aadarsh aur natikata ke bina jeevan kuchh bhi nahin hai

आदरणीय अध्यक्ष महोदय, सदन का मत है -  आदर्श और नैतिकता के बिना जीवन कुछ भी नहीं है; मैं इससे सहमत हूँ।

मान्यवर, हम गुफाओं और कन्दराओं में नहीं रहते, न ही उनके सपने पालते हैं, हजारों साल पहले छोड़ दी वह दुनिया, आज तो हम  आकाश में उड़ते हैं, पाँव रखते हैं ज़मीं पर, साथ लेके कारवाँ चलते हैं, रोजाना आगे बढ़ जाते है, कदमों के  निशां छूट जाते हैं, एक पल में पुरानी पड़ जाती दुनिया क्योंकि हर पल हम नई दुनिया बनाते है। खाना, पीना और सोना यह कार्य तो पशुओं के द्वारा भी किया जाता है।  शिकार करना, मरे हुए जानवर को एक दूसरे से छीना झपटी करके खाने का चलन सभ्य और   सिस्टर शिष्ट इंसानों की दुनिया में होता हो, ऐसा कभी मैंने न तो देखा है न सुना है।  इंसान और जानवर के परिवारों में, उनकी परंपराओं में, जीवन को जीने के तौर-तरीकों में जमीन आसमान का अंतर है। जानवरों के घर से जिनकी तुलना नहीं की जा सकती ऐसी ऊँची-ऊँची और बड़ी-बड़ी इमारतों में रहने वाला, नए-नए आविष्कार करने वाला, प्रकृति को चुनौती देने वाला मानव एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक है इसलिए नियम है, कानून है, व्यवस्थाएँ हैं, आचरण की सीमाएँ हैं, इंद्रियों पर नियंत्रण है और प्रत्येक मानव समाज का अभिन्न अंग है। क्योंकि उसकी स्थिति अकेली नहीं है उसका अपना परिवार है, समाज है, सामाजिक अधिकार हैं इसलिए जीवन के आदर्श हैं और नैतिकता का पालन उसके सुखी जीवन का रहस्य है ।

मान्यवर, मैं अपने विपक्षी वक्ताओं से पूछना चाहूँगा कि क्या वे नहीं चाहेंगे कि उनका परिवार सुरक्षित हो, क्या वे नहीं चाहेंगे कि इस संसार में जन्मा प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को सुख और सुविधाओं के साथ आनन्दपूर्वक बिताए? क्या वे नहीं चाहेंगे कि उन्हें भी चिकित्सा,  शिक्षा आदि की तमाम  सुविधाएँ मिलें? वे किस नज़रिए से देखना चाहते है यह तो वे ही जाने पर, मेरा मत है आदर्श और नैतिकता सामाजिक जीवन के वे अ-लिखित कानून हैं जिनकी अनिवार्यता को नकारा नहीं जा सकता। यदि नकारा गया तो पशुओं और हमारे जीवन में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।

मान्यवर, हजारों साल से सभ्यताएँ इस पृथ्वी पर अपनी अस्तित्व बनाए हैं, इसका कुछ तो रहस्य होगा; जीवन में जिन वस्तुओं की कल्पनाएँ थीं वे आज यर्थाथ है, इस विकास के पीछे कुछ तो रहस्य  होगा; आप सब यहाँ पर चुपचाप शांति से बैठे हैं, कुछ तो बात है। कुछ रहस्य तो जरुर है। मान्यवर, यह आदर्श और नैतिकता का ही बंधन है जिसमें बंध कर दुनिया चलती आई है; जिसमें बँधकर विकास की यात्राएँ हुई हैं और जिसमें बँधकर आप सब चुपचाप बैठे इस प्रतियोगिता का आनन्द ले रहे हैं। यही जीवन का आनन्द है। आदर्श और नैतिकता मानव के सामाजिक जीवन की वह  सशक्त नींव है जिसके कारण आज भी सभ्यताएँ जिन्दा हैं अन्यथा बहुत पहले ही मानव-जीवन का अंत हो चुका होता।

मान्यवर, कौन इस सदन में बैठा है जो अपने से उम्र में बड़े लोगों और महिलाओं का सम्मान न करता हो; कौन इस सदन में है जो ईमानदारी और सत्य का पालन करने को तिरस्कार के योग्य समझता हो; कौन नहीं चाहता है कि उसे भी आगे बढ़ने का अवसर मिले; कौन नहीं सोचता है कि परीक्षा में मेहनत का प्रतिफल मिले; कौन नहीं चाहता है कि उसका परिवार समाज में सुरक्षित रहे ? बहुत-सी ऐसी बातें हैं जिनका मूल  आदर्श और नैतिकता ही है। बात चाहे जिम्मेदारियों की हो, कानून व्यवस्था की हो, समान अवसरों की हो या सामाजिक व्यवस्था की हो इनका सही तरह से संचालन मानव मात्र के द्वारा उसके  आदर्श और नैतिकता के निर्वहन से ही संभव हो सकता है।

मान्यवर, कैसे कहूँ कि इंसान के लिए सबसे बड़े कानून का रास्ता उसके आचरण से हो कर नहीं जाता है? कैसे कहूँ कि मानव अपनी इच्छाओं को अनियंत्रित करने पर सामाजिक व्यवस्था की दोषपूर्ण इकाई नहीं बन जाता? कैसे कहूँ, कि मानव जीवन का आनन्द सबसे अलग-थलग होकर रहने में है ? कैसे कहूँ, कि मानव का सिर्फ अपने ही अपने लाभ के बारे में सोचना पशु- प्रवृत्ति नहीं  है ? मान्यवर, मेरे विपक्षी वक्ता अपने आचरण, अपनी इच्छाओं को संयम में न रखना चाहते हो; सबसे-अलग थलग होकर जीवन बिताना चाहते हों और सिर्फ अपने ही लाभ के बारे में सोचना चाहते हों तो उन्हें एक ही काम करना है अपने जीवन को सामाजिक-जीवन के बंधन से मुक्त करना है और इसके लिए कुछ और करने की जरुरत नहीं  आदर्श और नैतिकता का त्याग करना है। ।।धन्यवाद ।।
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आदर्श और नैतिकता के बिना जीवन कुछ भी नहीं है -  विपक्ष

आदरणीय अध्यक्ष महोदय, सदन का मत है -  आदर्श और नैतिकता के बिना जीवन कुछ भी नहीं है; मैं इससे सहमत नहीं हूँ।

मान्यवर, कितने ही विपक्षी आए, अपना मत प्रस्तुत किया और चले गए, पर किसी ने यह नहीं कहा, कि साँस के बिना जीवन नहीं है; किसी ने यह भी नहीं कहा, कि आजादी के बिना जीवन नहीं है; किसी ने भी यह भी नहीं कहा कि अकेले व्यक्ति का कोई जीवन नहीं है। यह मेरे लिए यह बहुत आश्चर्य की बात है। मान्यवर, जब पेट में चूहे उछल-कूद मचाते हैं, तो अच्छे-अच्छे का जीवन संकट में आ जाता है; जब प्यासे को पानी नहीं मिलता है, तो दुनिया के सारे आदर्श और नैतिकता के अध्याय, दम तोड़ देते हैं। यदि आज सब कुछ है, खाने को रोटी है, पहनने को कपड़ा है, रहने को घर है और, तन और मन, दोनों की शांति है तब हमें भूखे और नंगे की फिक्र होती है; तब हमें समाज के लिए कुछ करने का ध्यान आता है? मेरे विपक्षी वक्ता, इस बात को  भला, कैसे भूल सकते हैं?  

मान्यवर, कभी हम कहते हैं, मनुष्य सामाजिक प्राणी है; कभी हम कहते हैं, जानवरों जैसा व्यवहार मत करो; दुनिया के सारे महान ग्रंथ कहते हैं - हमें सबके साथ मिलजुल कर रहना चाहिए, सबसे प्रेम करना चाहिए, सबके प्रति दया की भावना रखनी चाहिए, दूसरों की चीजों पर कब्जा नहीं करना चाहिए, जितना हमारे पास है, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए और तो और, सदन भी यही कह रहा है कि आदर्श और नैतिकता के बिना जीवन कुछ भी नहीं है, अर्थात् , इनका पालन करना चाहिए। क्या मेरे विपक्षी वक्ता बताएँगें कि इन सब बातों को कहने की  आवश्यकता कहाँ है ? यदि मनुष्य सामाजिक प्राणी है तो इन सब बातों को कहने की आवश्यकता, नहीं होनी चाहिए । फिर भी कही जा रही हैं। दुनिया की सबसे प्राचीन संस्कृति में ,उसके अतीत से लेकर वर्तमान तक की यात्रा में, हजारों बार यह बात कही गई है , और, आज भी कह रहे हैं , और सबसे मजेदार बात, दुनिया हजारों साल से चल रही है।


मान्यवर, अपने घर का कूड़ा साफ करो और खिड़की से बाहर फेंक दो चाहे वह फिर किसी का अभिषेक करे या चरण-वन्दना? साधु संतो की इतनी बड़ी जमात, किसी  देश में नहीं मिलेगी जो कि इस देश में है; स्वयं ने चाहे कभी कोई ढंग का काम न किया हो, पर दूसरों के कामों में कमजोरियाँ निकालने वाला वर्ग, इस देश के अलावा क्या कहीं और मिल सकता है; आदर्श और नैतिकता का ढोल पीटने वाले लोग, दिल से कितने काले हैं, यह जानने की कोशिश एक बार भी की गई तो जानते हैं क्या होगा ? मशीन फेल हो जाएँगी, क्योंकि उनके आँकड़े,  मशीन के स्टोरेज क्षमता से बाहर ही होंगे।  आदर्श कहते हैं, सत्य बोलो ? प्रतिदिन हमारे मन में कितने ही विचार ऐसे उठते हैं, जिनको सत्यता के साथ बताएँ तो यह काॅलेज ही नहीं, सारी सामाजिक व्यवस्था ही चरमरा जाएगी। इसीलिए हम कहते हैं, नैतिकता को अपनाओ। नैतिकता यानि जो नीति के अनुसार हो, नीति, जो कर्त्तव्य के अनुसार हो,  कर्त्तव्य जो समय के अनुसार हो और समय जो वर्तमान हो यानि नैतिकता, अर्थात् वर्तमान की  आवश्यकता के अनुसार चलना। सेना सीमाओं की रक्षा करना छोड़ दे, पुलिस नगर की कानून व्यवस्था का जिम्मा छोड़ दे, चिकित्सक चिकित्सा करना छोड़ दें, मेरे विपक्षी वक्ता, आप मंच छोड़ दें , और सभी, इस प्रकार अपना कर्त्तव्य छोड़ देंगे उस समय हम किस नैतिकता की बात कर सकेंगे। जीवन बहुत कुछ है, जीवन में बहुत कुछ हैं, सिर्फ आदर्श और नैतिकता के बल पर जीवन नहीं चलता। हर जीव की अपनी आत्मा होती है, हर जीव की अपनी साँस होती है, उसकी अपनी आजादी होती है, हर जीव का एक आचार होता है, एक विचार होता है, हृदय में हिलोरे लेता प्यार होता है, दुःख देखकर दुःखी होता है, सुख से सुखी होता है, माँ के आँचल में पलता है, पिता की बाहों में मचलता है, कभी आँखों से अहसास बन गिरता है, कभी मोती-सा किसी के दिल में उतरता है; जीवन, सिर्फ आदर्श और नैतिकता नहीं है; जीवन,  अपनत्व में हैं; जीवन, प्यार में हैं; जीवन, दुलार में है; मेरे दोस्त!  जीवन, आत्मा के खिलने का अवसर है, वह न किसी वाद में है और न किसी विवाद में है।     ||धन्यवाद||
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